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Saturday, October 24, 2026 10:33 am

पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज ड्यूटी में बड़ी कटौती: सरकार ने घटाया टैक्स, लेकिन क्या सस्ता होगा ईंधन? | Govt Cuts Excise Duty on Fuel: Will Petrol-Diesel Prices Fall Now?

भारत में बढ़ते वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच केंद्र सरकार ने बड़ा आर्थिक फैसला लेते हुए पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी में भारी कटौती की है। यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं और आम जनता पर महंगाई का दबाव बढ़ने की आशंका थी।

सरकार ने पेट्रोल पर विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क (excise duty) को ₹13 प्रति लीटर से घटाकर ₹3 प्रति लीटर कर दिया है, जबकि डीजल पर यह शुल्क पूरी तरह समाप्त कर दिया गया है, जो पहले ₹10 प्रति लीटर था।

यह कटौती सीधे तौर पर ₹10 प्रति लीटर की राहत के रूप में देखी जा रही है, लेकिन इसका असर आम उपभोक्ताओं तक तुरंत पहुंचेगा या नहीं—यह सबसे बड़ा सवाल बना हुआ है।

इस फैसले के पीछे सबसे बड़ा कारण पश्चिम एशिया में चल रहा युद्ध और होर्मुज़ जलडमरूमध्य के आसपास की स्थिति है, जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति प्रभावित हुई है। कच्चे तेल की कीमतें पिछले एक महीने में लगभग 70 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 120 डॉलर के आसपास पहुंच गई हैं।

सरकार के सामने दो विकल्प थे—या तो बढ़ती कीमतों का पूरा बोझ सीधे आम जनता पर डाला जाए, या फिर खुद राजस्व घाटा झेलकर कीमतों को नियंत्रित रखा जाए। सरकार ने दूसरा रास्ता चुना और टैक्स कम कर दिया, ताकि देश में ईंधन की कीमतें अचानक न बढ़ें।

हालांकि, यह समझना जरूरी है कि भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें पूरी तरह सरकार तय नहीं करती। तेल कंपनियां—जैसे इंडियन ऑयल, बीपीसीएल और एचपीसीएल—अंतरराष्ट्रीय कीमतों, डॉलर-रुपया विनिमय दर और अपने मार्जिन के आधार पर रिटेल कीमत तय करती हैं।

यही वजह है कि एक्साइज ड्यूटी में कटौती के बावजूद पेट्रोल-डीजल के दाम तुरंत कम नहीं हो सकते। विशेषज्ञों का मानना है कि तेल कंपनियां इस राहत का उपयोग पहले से हो रहे घाटे को कम करने में कर सकती हैं, बजाय इसके कि सीधे कीमतें घटाई जाएं।

दरअसल, मौजूदा हालात में तेल कंपनियां हर लीटर पेट्रोल और डीजल पर भारी नुकसान उठा रही हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, कंपनियां प्रति लीटर लगभग ₹48 तक का नुकसान झेल रही हैं, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय कीमतें बहुत ज्यादा बढ़ चुकी हैं।

इस फैसले का एक और पहलू है—सरकार का राजस्व। एक्साइज ड्यूटी में इतनी बड़ी कटौती का मतलब है कि सरकार को हजारों करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ेगा। अनुमान है कि यह कदम केंद्र के खजाने पर बड़ा वित्तीय दबाव डाल सकता है।

हालांकि सरकार ने इस नुकसान की भरपाई के लिए कुछ अन्य कदम भी उठाए हैं। जैसे डीजल और एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) के निर्यात पर अतिरिक्त टैक्स लगाया गया है, ताकि घरेलू बाजार में ईंधन की उपलब्धता बनी रहे और कंपनियां ज्यादा निर्यात न करें।

यह पूरा घटनाक्रम केवल भारत तक सीमित नहीं है। दुनिया के कई देशों में पेट्रोल-डीजल की कीमतें 20% से 50% तक बढ़ चुकी हैं। ऐसे में भारत में कीमतों को नियंत्रित रखना सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है।

सामाजिक स्तर पर इस फैसले को राहत और रणनीतिक कदम दोनों के रूप में देखा जा रहा है। जहां एक ओर लोग इसे संभावित महंगाई से बचाने वाला कदम मान रहे हैं, वहीं कुछ विशेषज्ञ इसे “अस्थायी राहत” बता रहे हैं, जो लंबे समय तक टिकाऊ नहीं हो सकती।

सोशल मीडिया पर भी इस फैसले को लेकर बहस तेज है। कुछ लोग सरकार के इस कदम की सराहना कर रहे हैं, जबकि कुछ का कहना है कि जब तक अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतें स्थिर नहीं होतीं, तब तक घरेलू बाजार में भी स्थिरता संभव नहीं है।

आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम “प्राइस शॉक” को रोकने के लिए लिया गया है, न कि तुरंत कीमतें घटाने के लिए। यानी आने वाले समय में पेट्रोल-डीजल की कीमतें भले ही तुरंत कम न हों, लेकिन अचानक बढ़ने से जरूर रोकी जा सकती हैं।

आगे की स्थिति पूरी तरह वैश्विक बाजार पर निर्भर करेगी। अगर पश्चिम एशिया का संकट लंबा चलता है और कच्चे तेल की कीमतें और बढ़ती हैं, तो भारत में भी ईंधन की कीमतों पर दबाव बना रहेगा।

कुल मिलाकर, सरकार की यह एक्साइज ड्यूटी कटौती एक “राहत कवच” की तरह है, जो फिलहाल आम लोगों को बड़े झटके से बचाने की कोशिश कर रही है। लेकिन यह स्थायी समाधान नहीं है।

अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि क्या आने वाले दिनों में पेट्रोल-डीजल के दाम वास्तव में कम होंगे या यह राहत केवल कंपनियों के घाटे को कम करने तक सीमित रह जाएगी।

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