फिल्म की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह केवल आतंकवादी हमले की भयावहता दिखाने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया, अभियोजन पक्ष की चुनौतियों और एक वकील की निजी जिंदगी पर भी ध्यान देती है। निर्देशक अविनाश अरुण ने संवेदनशील विषय को प्रस्तुत करते समय कई जगह संतुलन बनाए रखने की कोशिश की है।
फिल्म की कहानी वास्तविक घटनाओं से प्रेरित है, लेकिन इसे सिनेमाई रूप देने के लिए कुछ दृश्यों और किरदारों को नाटकीय तरीके से पेश किया गया है। इसलिए इसे पूरी तरह घटनाओं का दस्तावेज मानने के बजाय एक वास्तविक मामले पर आधारित फिल्म के रूप में देखना बेहतर होगा।
क्या है Prahaar फिल्म की कहानी?
‘प्रहार’ की शुरुआत उज्ज्वल निकम के एक अदालत संबंधी दृश्य से होती है। वह 1993 के मुंबई बम धमाकों के मामले में बड़े साजिशकर्ताओं को न्याय के कटघरे तक नहीं पहुंचा पाने को लेकर अपनी निराशा जाहिर करते हैं। इसके बाद कहानी 26 नवंबर 2008 के मुंबई आतंकी हमलों की ओर बढ़ती है।
मुंबई में हुए इन हमलों ने पूरे देश को झकझोर दिया था। कई प्रमुख स्थानों पर आतंकवादियों ने हमला किया और बड़ी संख्या में निर्दोष लोगों की जान चली गई। हमलों में शामिल अजमल कसाब को जिंदा पकड़ा गया, जिसके बाद उसके खिलाफ मुकदमा चला।
फिल्म का मुख्य फोकस कसाब के मुकदमे और उज्ज्वल निकम की अभियोजन भूमिका पर है। कहानी में यह दिखाया गया है कि निकम किस तरह अदालत में सबूतों, गवाहियों और कानूनी दलीलों के माध्यम से अपना पक्ष रखते हैं।
फिल्म पाकिस्तान में आतंकवादी प्रशिक्षण, हमलों की साजिश और आतंकवादियों के बयानों से जुड़े पहलुओं को भी सामने लाती है। साथ ही, यह दिखाने की कोशिश करती है कि इतने बड़े मामले में न्याय हासिल करने की प्रक्रिया कितनी जटिल हो सकती है।
हालांकि, फिल्म उज्ज्वल निकम के पूरे करियर की विस्तृत कहानी नहीं बताती। यह अपेक्षाकृत जल्दी कसाब के मुकदमे पर केंद्रित हो जाती है। जिन दर्शकों को निकम के शुरुआती जीवन और उनके दूसरे चर्चित मामलों के बारे में विस्तार से जानने की उम्मीद है, उन्हें फिल्म कुछ सीमित लग सकती है।
राजकुमार राव ने उज्ज्वल निकम के किरदार में कैसा काम किया?
राजकुमार राव फिल्म की सबसे बड़ी ताकत हैं। उन्होंने उज्ज्वल निकम के किरदार को गंभीरता और आत्मविश्वास के साथ निभाया है। अदालत के दृश्यों में उनका संवाद बोलने का तरीका, चेहरे के भाव और विरोधी पक्ष के साथ बहस करने की शैली किरदार को प्रभावशाली बनाती है।
राजकुमार राव इससे पहले भी वास्तविक जीवन के व्यक्तित्वों से प्रेरित किरदारों में अपनी अभिनय क्षमता दिखा चुके हैं। ‘प्रहार’ में भी वह जरूरत से ज्यादा नाटकीय होने के बजाय कहानी और किरदार के अनुरूप अभिनय करते दिखाई देते हैं।
कुछ संवाद काफी तीखे और भावनात्मक हैं, लेकिन अभिनेता उन्हें इस तरह प्रस्तुत करते हैं कि अदालत की बहस का तनाव बना रहता है। फिल्म का बड़ा हिस्सा उनके कंधों पर टिका है और वह इस जिम्मेदारी को काफी हद तक निभाते हैं।
हालांकि, कहानी में उज्ज्वल निकम को कई बार बेहद आदर्शवादी और न्याय के लिए हर सीमा तक जाने वाले वकील के रूप में दिखाया गया है। इससे उनके व्यक्तित्व के दूसरे पहलुओं को समझने की गुंजाइश कुछ कम हो जाती है।
ललित प्रभाकर ने अजमल कसाब के किरदार में छोड़ी छाप
फिल्म में ललित प्रभाकर का अभिनय खास तौर पर ध्यान खींचता है। अजमल कसाब जैसे संवेदनशील और भयावह वास्तविक किरदार को पर्दे पर निभाना आसान नहीं था, लेकिन अभिनेता ने उसके अलग-अलग व्यवहारों को प्रभावशाली तरीके से प्रस्तुत किया है।
कई दृश्यों में कसाब की हिंसक गतिविधियां और निर्दोष लोगों पर किए गए हमले दर्शकों के भीतर गुस्सा और बेचैनी पैदा करते हैं। वहीं, पूछताछ और जेल से जुड़े दृश्यों में उसका व्यवहार एक अलग तरह का तनाव पैदा करता है।
फिल्म कसाब के व्यक्तित्व को समझने की कोशिश करती है, लेकिन उसके अपराधों को उचित ठहराने का प्रयास नहीं करती। यही अंतर इस किरदार को केवल एक सामान्य खलनायक की तरह पेश करने से फिल्म को बचाता है।
ललित प्रभाकर का काम फिल्म के सबसे उल्लेखनीय पक्षों में शामिल है।
जयदीप अहलावत और ऋत्विक साहोरे का अभिनय कैसा है?
जयदीप अहलावत फिल्म में चौधरी जुल्फिकार का किरदार निभाते हैं। राजकुमार राव के साथ उनके दृश्य फिल्म के यादगार हिस्सों में शामिल हैं। दोनों कलाकारों के बीच कानूनी बहस और बातचीत में अच्छा तालमेल दिखाई देता है।
जयदीप अहलावत अपने सीमित स्क्रीन टाइम में भी प्रभाव छोड़ते हैं। उनकी मौजूदगी अदालत से जुड़े दृश्यों को अतिरिक्त गंभीरता देती है।
ऋत्विक साहोरे ने उज्ज्वल निकम के बेटे अनिकेत की भूमिका निभाई है। उनका किरदार फिल्म के पारिवारिक पक्ष को सामने लाता है। वह अपने पिता से समय और भावनात्मक जुड़ाव चाहते हैं, लेकिन निकम का अधिकांश ध्यान पेशेवर जिम्मेदारियों पर रहता है।
पिता और बेटे के बीच टकराव के दृश्य कहानी में भावनात्मक गहराई जोड़ते हैं। इनके माध्यम से फिल्म यह दिखाने की कोशिश करती है कि सार्वजनिक जीवन में बड़ी जिम्मेदारियां निभाने वाले लोगों की निजी जिंदगी भी कई बार प्रभावित होती है।
वामीका गब्बी निकम की पत्नी ज्योति की भूमिका में हैं। फिल्म में उनके किरदार के जरिए परिवार पर पड़ने वाले दबाव को दिखाया गया है।
फिल्म की सबसे बड़ी खासियत क्या है?
‘प्रहार’ की सबसे बड़ी खासियत इसका अदालत की कार्यवाही पर ध्यान देना है। आमतौर पर आतंकवाद पर आधारित फिल्मों में हमले, पीछा करने वाले दृश्य और भावनात्मक संवाद ज्यादा जगह लेते हैं। इस फिल्म में भी ऐसे दृश्य हैं, लेकिन इसका मुख्य जोर कानूनी प्रक्रिया पर है।
फिल्म यह दिखाती है कि गंभीर अपराध के आरोपी को सजा दिलाने के लिए केवल जनभावनाएं पर्याप्त नहीं होतीं। अदालत में सबूतों और कानूनी दलीलों के आधार पर मामला आगे बढ़ता है।
यह पहलू कहानी को महत्वपूर्ण बनाता है, क्योंकि कसाब का मुकदमा भारतीय न्याय व्यवस्था के इतिहास का एक बेहद चर्चित मामला रहा है। फिल्म के जरिए दर्शकों को अभियोजन पक्ष के काम और मुकदमे की जटिलताओं का सिनेमाई परिचय मिलता है।
दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि फिल्म आतंकवाद को किसी पूरे धार्मिक समुदाय के साथ जोड़ने से काफी हद तक बचती है। कहानी का जोर आतंकवादी हमलों, उनके पीछे की साजिश और अपराधियों की जवाबदेही पर है।
Prahaar फिल्म में क्या कमियां हैं?
फिल्म की सबसे बड़ी कमी यह है कि उज्ज्वल निकम की पूरी यात्रा को विस्तार से दिखाने के बजाय कहानी तेजी से कसाब के मुकदमे पर पहुंच जाती है। शीर्षक से दर्शकों को निकम के जीवन और करियर की व्यापक कहानी की उम्मीद हो सकती है, लेकिन फिल्म उस दायरे को पूरी तरह नहीं खोलती।
इसके अलावा, निकम का किरदार कई दृश्यों में बहुत अधिक आदर्शवादी दिखाई देता है। वह न्याय के लिए संघर्ष करने वाले दृढ़ वकील के रूप में सामने आते हैं, लेकिन उनके व्यक्तित्व के दूसरे पहलुओं को पर्याप्त जगह नहीं मिलती।
कुछ दृश्यों में राजनीतिक और प्रशासनिक हस्तियों के सामने निकम के लंबे संवाद कहानी को जरूरत से ज्यादा नाटकीय बना देते हैं। इससे फिल्म का वह संतुलन थोड़ा प्रभावित होता है, जिसे निर्देशक ने बाकी हिस्सों में बनाए रखने की कोशिश की है।
एक महत्वपूर्ण कमी पुलिस अधिकारी एएसआई तुकाराम ओंबले की बहादुरी को पर्याप्त जगह न देना भी है। वास्तविक घटनाओं में ओंबले ने कसाब को जिंदा पकड़ने में असाधारण साहस दिखाया था। फिल्म में उनकी भूमिका को अधिक विस्तार से दिखाया जा सकता था।
उनके योगदान पर एक प्रभावशाली दृश्य फिल्म की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को और मजबूत बना सकता था।
क्या Prahaar सच्ची घटनाओं पर आधारित है?
हां, फिल्म वास्तविक घटनाओं और उज्ज्वल निकम की पेशेवर भूमिका से प्रेरित है। इसकी कहानी 26/11 मुंबई आतंकी हमलों, अजमल कसाब के मुकदमे और आतंकवाद से जुड़े कानूनी घटनाक्रमों के इर्द-गिर्द घूमती है।
हालांकि, वास्तविक घटनाओं पर आधारित फिल्मों में कई बार समय, संवाद, किरदारों और घटनाओं को सिनेमाई प्रभाव के लिए संक्षिप्त या नाटकीय बनाया जाता है। इसलिए फिल्म के प्रत्येक दृश्य को ऐतिहासिक रिकॉर्ड का हूबहू चित्रण नहीं मानना चाहिए।
‘प्रहार’ का उद्देश्य एक चर्चित कानूनी मामले को मनोरंजक और भावनात्मक सिनेमाई अनुभव में बदलना है। दर्शक इसे देखने के बाद वास्तविक मुकदमे और उससे जुड़े ऐतिहासिक तथ्यों के बारे में अलग से जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
क्या आपको Prahaar फिल्म देखनी चाहिए?
अगर आपको वास्तविक घटनाओं पर आधारित फिल्में, कोर्टरूम ड्रामा और गंभीर विषयों पर बनी कहानियां पसंद हैं, तो ‘प्रहार’ आपके लिए देखने लायक फिल्म हो सकती है।
राजकुमार राव का अभिनय, ललित प्रभाकर का कसाब के रूप में रूपांतरण और जयदीप अहलावत के साथ उनके दृश्यों में अच्छा तालमेल फिल्म को मजबूत बनाता है। इसके अलावा, कहानी न्यायिक प्रक्रिया को केंद्र में रखती है, जो इसे सामान्य एक्शन फिल्मों से अलग पहचान देती है।
हालांकि, अगर आप उज्ज्वल निकम के पूरे जीवन और करियर पर आधारित विस्तृत बायोपिक की उम्मीद कर रहे हैं, तो फिल्म आपको कुछ अधूरी लग सकती है। इसकी कहानी का मुख्य फोकस कसाब के मुकदमे पर है, न कि निकम के जीवन के हर चरण पर।
Prahaar Movie Review: अंतिम फैसला
‘प्रहार: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ उज्ज्वल निकम’ एक गंभीर विषय पर बनी फिल्म है, जो 26/11 मुंबई आतंकी हमलों के बाद हुई कानूनी लड़ाई को पर्दे पर लाने की कोशिश करती है। राजकुमार राव का संयमित अभिनय और ललित प्रभाकर का प्रभावशाली रूपांतरण इसकी प्रमुख खूबियां हैं।
फिल्म की कहानी कुछ जगहों पर जरूरत से ज्यादा आदर्शवादी हो जाती है और तुकाराम ओंबले जैसे महत्वपूर्ण व्यक्ति के योगदान को पर्याप्त जगह नहीं मिलती। इसके बावजूद, यह न्यायिक प्रक्रिया और आतंकवाद से जुड़े संवेदनशील विषय को अपेक्षाकृत संतुलित तरीके से प्रस्तुत करती है।
कुल मिलाकर, ‘प्रहार’ उन दर्शकों के लिए एक अच्छी पसंद हो सकती है, जिन्हें कोर्टरूम ड्रामा, वास्तविक घटनाओं पर आधारित कहानियां और गंभीर अभिनय पसंद है।



















