सुप्रीम कोर्ट ने शिवसेना (UBT) के राज्यसभा सांसद संजय राउत से मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और न्यायपालिका को लेकर दिए गए बयानों पर स्पष्टीकरण मांगा है। यह मामला राहुल गांधी समेत विपक्षी नेताओं की उस याचिका की सुनवाई के दौरान सामने आया, जिसमें चुनाव आयोग की मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR प्रक्रिया को चुनौती दी गई है।
16 अक्टूबर 2026 को सामने आई रिपोर्ट के अनुसार, अदालत ने संजय राउत की याचिका पर फिलहाल अस्थायी रूप से विचार करने की बात कही है। उनकी याचिका पर आगे की सुनवाई उनके आचरण के संबंध में स्पष्टीकरण देने की शर्त पर होगी। हालांकि, अदालत ने अभी उन्हें अवमानना का दोषी घोषित नहीं किया है।
संजय राउत से सुप्रीम कोर्ट ने क्यों मांगा जवाब?
यह पूरा मामला उस समय शुरू हुआ, जब विपक्षी नेताओं ने मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत से मुलाकात करने का अनुरोध किया था। विपक्षी नेता चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं को लेकर अपनी चिंताएं सामने रखना चाहते थे।
मुख्य न्यायाधीश ने विपक्षी प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात करने से इनकार करते हुए संबंधित मुद्दों को उचित कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से अदालत के समक्ष उठाने का रास्ता सुझाया। इसके बाद संजय राउत ने मुख्य न्यायाधीश और न्यायपालिका को लेकर सार्वजनिक बयान दिए।
15 अक्टूबर 2026 को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं की SIR से संबंधित याचिका पर सुनवाई की। इस दौरान संजय राउत के आचरण का मुद्दा भी उठा।
अदालत ने स्पष्ट किया कि राउत की याचिका पर फिलहाल विचार उनके स्पष्टीकरण देने की शर्त पर किया जा रहा है। इस घटनाक्रम ने न्यायपालिका और राजनीतिक नेताओं के बीच जारी विवाद को फिर चर्चा में ला दिया है।
संजय राउत ने न्यायपालिका को लेकर क्या कहा था?
संजय राउत ने अपने बयानों में आरोप लगाया था कि न्यायाधीश भारतीय जनता पार्टी के राजनीतिक कार्यक्रमों में शामिल होते हैं और कुछ राज्यों के मुख्यमंत्री उनके लिए रात्रिभोज आयोजित करते हैं।
उन्होंने न्यायाधीशों और राजनीतिक नेताओं के साथ बैडमिंटन खेलने से जुड़ी तस्वीरों का भी उल्लेख किया था। राउत ने सवाल उठाया कि यदि न्यायाधीश राजनीतिक नेताओं के साथ विभिन्न कार्यक्रमों में शामिल हो सकते हैं, तो लोकतंत्र से जुड़े मुद्दों पर चर्चा करने के लिए विपक्षी नेताओं से मुलाकात क्यों नहीं की जा सकती।
उनकी इन टिप्पणियों पर सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) ने आपत्ति जताई। एसोसिएशन का कहना है कि इस तरह के बयान न्यायपालिका की प्रतिष्ठा और सुप्रीम कोर्ट के अधिकार को प्रभावित कर सकते हैं।
हालांकि, राउत के आरोपों और उनके पीछे बताए गए तथ्यों का अंतिम कानूनी मूल्यांकन संबंधित न्यायिक प्रक्रिया के तहत ही होगा।
बैडमिंटन की तस्वीरों को लेकर क्या है विवाद?
इस मामले में बैडमिंटन खेलने से जुड़ी तस्वीरें भी विवाद का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। संजय राउत ने इन तस्वीरों का उल्लेख करते हुए न्यायाधीशों और राजनीतिक नेताओं के संबंधों पर सवाल उठाए थे।
सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन की याचिका के अनुसार, जिन तस्वीरों को लंदन में आयोजित कार्यक्रम से जोड़कर पेश किया गया था, वे वास्तव में नवंबर 2025 में दिल्ली के त्यागराज स्टेडियम में हुए एक कार्यक्रम की थीं।
इस संदर्भ में अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने दिल्ली हाईकोर्ट के 19 जून 2026 के आदेश का भी उल्लेख किया। तस्वीरों के स्थान और संदर्भ को लेकर उठे सवालों ने विवाद को और गंभीर बना दिया।
किसी तस्वीर के आधार पर किसी व्यक्ति के आचरण के बारे में निष्कर्ष निकालने से पहले उसका वास्तविक संदर्भ समझना जरूरी है। इस मामले में भी तस्वीरों से जुड़े दावों और उनके संदर्भ को लेकर कानूनी सवाल उठाए गए हैं।
संजय राउत और निखिल वागले के खिलाफ अवमानना याचिका
इस विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने संजय राउत और पत्रकार निखिल वागले के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की मांग की है।
15 अक्टूबर 2026 को अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने इस मामले में कार्यवाही शुरू करने के लिए सहमति दी। यह सहमति अवमानना की कानूनी प्रक्रिया का एक चरण है, न कि संबंधित व्यक्तियों को दोषी ठहराने वाला अंतिम फैसला।
SCBA ने आरोप लगाया कि दोनों के सार्वजनिक बयानों से मुख्य न्यायाधीश और न्यायपालिका की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने का प्रयास हुआ। अब इस मामले में आगे की कानूनी प्रक्रिया के तहत निर्णय लिया जाना है।
यह ध्यान रखना जरूरी है कि संजय राउत से स्पष्टीकरण मांगने वाली कार्यवाही और SCBA की आपराधिक अवमानना याचिका अलग-अलग कानूनी प्रक्रियाएं हैं।
क्या है आपराधिक अवमानना और इसमें क्या कार्रवाई हो सकती है?
भारत में आपराधिक अवमानना से संबंधित प्रावधान न्यायिक प्रक्रिया और अदालत के अधिकार की रक्षा के लिए बनाए गए हैं। अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 2(सी) में उन कृत्यों और प्रकाशनों का उल्लेख है, जो अदालत के अधिकार को कम करने या न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने जैसी परिस्थितियों से संबंधित हो सकते हैं।
हालांकि, न्यायपालिका की आलोचना करना और आपराधिक अवमानना करना एक ही बात नहीं है। किसी बयान पर अवमानना की कार्रवाई उचित है या नहीं, इसका निर्णय संबंधित तथ्यों, लागू कानून और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर किया जाता है।
इस मामले में अटॉर्नी जनरल की सहमति मिलने का अर्थ यह नहीं है कि संजय राउत या निखिल वागले को दोषी ठहरा दिया गया है। अंतिम निर्णय संबंधित कानूनी प्रक्रिया के बाद ही सामने आएगा।
राहुल गांधी और SIR याचिका से कैसे जुड़ा है मामला?
राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं ने चुनाव आयोग की विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। विपक्ष ने मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं और नाम जोड़ने या हटाने की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए हैं।
SIR का पूरा नाम Special Intensive Revision है। इसका उद्देश्य निर्धारित प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची की जांच और संशोधन करना है। इस प्रक्रिया में मतदाताओं के नाम, पात्रता और विवरणों की समीक्षा की जाती है।
विपक्षी नेताओं ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर अपनी चिंताएं रखी हैं। हालांकि, याचिका में लगाए गए आरोपों को अदालत द्वारा सिद्ध तथ्य नहीं माना जा सकता।
संजय राउत इस मामले में छठे याचिकाकर्ता हैं। अदालत ने उनकी याचिका पर अस्थायी रूप से विचार करते हुए उनके आचरण पर स्पष्टीकरण मांगा है। यह प्रक्रिया चुनाव आयोग की SIR व्यवस्था से जुड़े मूल कानूनी सवालों से अलग है।
आगे क्या हो सकता है?
अब संजय राउत को अदालत के समक्ष अपने आचरण के संबंध में स्पष्टीकरण देना होगा। उनके जवाब और मामले से जुड़े तथ्यों के आधार पर अदालत आगे की कार्रवाई पर विचार कर सकती है।
दूसरी ओर, SCBA की आपराधिक अवमानना याचिका भी अपनी अलग कानूनी प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ सकती है। इस मामले में संबंधित पक्षों की दलीलों और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर ही कोई अंतिम निर्णय लिया जाएगा।
SIR से संबंधित याचिका में भी चुनाव आयोग की प्रक्रिया और मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं को लेकर उठाए गए सवालों पर अदालत का रुख महत्वपूर्ण होगा।
फिलहाल, इस मामले में किसी संभावित दंड या अंतिम परिणाम को लेकर निश्चित निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। आगे की स्थिति अदालत के आदेशों और संबंधित पक्षों के जवाबों से स्पष्ट होगी।
निष्कर्ष
संजय राउत और CJI सूर्यकांत से जुड़ा विवाद न्यायपालिका की गरिमा, राजनीतिक आलोचना की सीमाओं और चुनाव आयोग की SIR प्रक्रिया को लेकर उठे सवालों को एक साथ सामने लाता है। सुप्रीम कोर्ट ने राउत से उनके आचरण पर स्पष्टीकरण मांगा है, जबकि सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने उनके और पत्रकार निखिल वागले के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की मांग की है।
फिलहाल, स्पष्टीकरण मांगने या अवमानना की कार्यवाही के लिए सहमति मिलने को अंतिम दोषसिद्धि नहीं माना जाना चाहिए। मामले का वास्तविक परिणाम आगे की न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही स्पष्ट होगा।



















