पिछले कुछ वर्षों में हाई-प्रोटीन डाइट का चलन तेजी से बढ़ा है। वजन घटाने से लेकर मसल्स गेन, डायबिटीज कंट्रोल से लेकर मेटाबॉलिज्म सुधारने तक—हर जगह प्रोटीन को “हीरो न्यूट्रिएंट” के रूप में पेश किया जा रहा है। जिम जाने वाले युवा, कीटो या लो-कार्ब डाइट फॉलो करने वाले लोग, इंटरमिटेंट फास्टिंग करने वाले, यहां तक कि सामान्य वजन घटाने की कोशिश करने वाले भी अपनी प्लेट में प्रोटीन बढ़ा रहे हैं।
लेकिन इसी के साथ एक आम शिकायत सामने आ रही है—कब्ज।
बहुत से लोग बताते हैं कि जैसे ही उन्होंने हाई-प्रोटीन डाइट शुरू की, पेट साफ होना कम हो गया, मल सख्त हो गया या शौच में परेशानी होने लगी। तो क्या सच में हाई-प्रोटीन डाइट कब्ज बढ़ाती है? या समस्या कहीं और है?
इस विस्तृत लेख में हम वैज्ञानिक, पोषणीय और व्यावहारिक दृष्टिकोण से समझेंगे कि हाई-प्रोटीन डाइट और कब्ज के बीच क्या संबंध है, किन परिस्थितियों में जोखिम बढ़ता है और कैसे संतुलन बनाकर इस समस्या से बचा जा सकता है।
हाई-प्रोटीन डाइट क्या होती है?
हाई-प्रोटीन डाइट वह आहार है जिसमें व्यक्ति की दैनिक कैलोरी का बड़ा हिस्सा प्रोटीन से आता है। सामान्यतः:
एक सामान्य वयस्क को 0.8 ग्राम प्रोटीन प्रति किलोग्राम शरीर वजन की जरूरत होती है।
हाई-प्रोटीन डाइट में यह मात्रा 1.2 से 2.2 ग्राम प्रति किलोग्राम तक जा सकती है।
हाई-प्रोटीन डाइट में आमतौर पर शामिल होते हैं:
अंडे
चिकन, मछली, टर्की
पनीर, ग्रीक योगर्ट
दालें, राजमा, चना
सोया और टोफू
व्हे या केसिन प्रोटीन सप्लीमेंट
प्रोटीन बार और शेक
अक्सर इस डाइट में कार्बोहाइड्रेट, खासकर रिफाइंड कार्ब्स कम कर दिए जाते हैं। कई लोग साबुत अनाज भी कम कर देते हैं।
यहीं से समस्या शुरू हो सकती है।
कब्ज क्या है और कैसे होती है?
कब्ज वह स्थिति है जिसमें:
सप्ताह में तीन से कम बार मल त्याग हो
मल सख्त और सूखा हो
शौच के दौरान अधिक जोर लगाना पड़े
पेट पूरी तरह साफ न लगे
मल सख्त क्यों होता है?
बड़ी आंत (कोलन) का काम है:
पानी को अवशोषित करना
मल को आकार देना
यदि मल लंबे समय तक कोलन में रुकता है, तो उससे अधिक पानी अवशोषित हो जाता है, जिससे वह कठोर और सूखा हो जाता है।
यह स्थिति फाइबर की कमी, पानी की कमी, शारीरिक निष्क्रियता या हार्मोनल बदलाव से जुड़ी हो सकती है।
क्या प्रोटीन खुद कब्ज का कारण है?
सरल उत्तर: प्रोटीन खुद सीधे कब्ज का कारण नहीं है।
लेकिन हाई-प्रोटीन डाइट की संरचना ऐसी हो सकती है कि कब्ज का जोखिम बढ़ जाए।
समस्या प्रोटीन से अधिक फाइबर की कमी और आहार संतुलन बिगड़ने से जुड़ी है।
कब्ज और फाइबर का संबंध
फाइबर दो प्रकार का होता है:
घुलनशील फाइबर (Soluble Fiber)
यह पानी सोखकर जेल जैसा बनता है और मल को नरम करता है।अघुलनशील फाइबर (Insoluble Fiber)
यह मल का आयतन बढ़ाता है और आंतों की गति तेज करता है।
महत्वपूर्ण तथ्य:
प्रोटीन में फाइबर नहीं होता।
यदि हाई-प्रोटीन डाइट के कारण:
फल कम हो जाएँ
सब्जियाँ घट जाएँ
साबुत अनाज हट जाएँ
तो कुल फाइबर सेवन कम हो जाता है।
यही कब्ज की जड़ है।
हाई-प्रोटीन डाइट में कब्ज क्यों बढ़ सकती है?
1. लो-कार्ब और लो-फाइबर कॉम्बिनेशन
कई हाई-प्रोटीन डाइट (जैसे कीटो) में:
ब्रेड, चावल, ओट्स हटाए जाते हैं
फल सीमित कर दिए जाते हैं
परिणाम: फाइबर कम।
2. एनिमल प्रोटीन पर अधिक निर्भरता
लाल मांस, चिकन, अंडे—इनमें फाइबर नहीं होता।
यदि प्लेट में सब्जियाँ नहीं हैं, तो पाचन प्रभावित हो सकता है।
3. पानी की कमी
प्रोटीन मेटाबॉलिज्म के लिए शरीर को अधिक पानी चाहिए।
यदि पानी कम पिया जाए:
मल सूख सकता है
कब्ज बढ़ सकती है
4. प्रोटीन सप्लीमेंट का प्रभाव
कुछ लोगों में:
व्हे प्रोटीन से गैस
केसिन से भारीपन
कृत्रिम स्वीटनर से पाचन गड़बड़ी
हो सकती है।
शरीर में क्या होता है जब फाइबर कम होता है?
जब फाइबर कम होता है:
मल का आयतन घटता है
कोलन की गति धीमी होती है
पानी अधिक अवशोषित होता है
मल कठोर बनता है
इसके कारण:
जोर लगाना पड़ता है
बवासीर का खतरा बढ़ता है
हाई-प्रोटीन डाइट और गट माइक्रोबायोम
आंतों में अरबों अच्छे बैक्टीरिया रहते हैं।
वे फाइबर को तोड़कर शॉर्ट-चेन फैटी एसिड बनाते हैं, जो:
आंतों को स्वस्थ रखते हैं
सूजन कम करते हैं
मल को नियमित बनाते हैं
यदि फाइबर कम हो जाए:
अच्छे बैक्टीरिया कम हो सकते हैं
पाचन संतुलन बिगड़ सकता है
यह कब्ज का अप्रत्यक्ष कारण बन सकता है।
किन लोगों में कब्ज का जोखिम अधिक?
कीटो या लो-कार्ब डाइट फॉलो करने वाले
केवल प्रोटीन शेक पर निर्भर लोग
ऑफिस में लंबे समय तक बैठने वाले
पानी कम पीने वाले
पहले से कब्ज से पीड़ित लोग
बुजुर्ग
क्या प्लांट-आधारित हाई-प्रोटीन डाइट सुरक्षित है?
हाँ, अक्सर अधिक संतुलित होती है।
उदाहरण:
दालें
चना
राजमा
सोया
क्विनोआ
इनमें:
प्रोटीन
फाइबर
दोनों होते हैं।
इसलिए शाकाहारी हाई-प्रोटीन डाइट में कब्ज का जोखिम अपेक्षाकृत कम होता है।
क्या हर किसी को कब्ज होगी?
नहीं।
यदि आप:
पर्याप्त फाइबर लेते हैं
8–10 गिलास पानी पीते हैं
नियमित व्यायाम करते हैं
प्रोबायोटिक लेते हैं
तो हाई-प्रोटीन डाइट के बावजूद कब्ज की संभावना कम है।
हाई-प्रोटीन डाइट लेते समय किन बातों का ध्यान रखें?
1. हर भोजन में फाइबर जोड़ें
प्लेट का आधा हिस्सा सब्जियाँ रखें
सलाद शामिल करें
ओट्स या ब्राउन राइस लें
2. बीज शामिल करें
चिया सीड्स
अलसी
इसबगोल (डॉक्टर की सलाह से)
3. पानी की मात्रा बढ़ाएँ
प्रोटीन बढ़ा रहे हैं तो पानी भी बढ़ाएँ।
4. प्रोबायोटिक्स
दही
छाछ
किण्वित खाद्य
5. नियमित गतिविधि
भोजन के बाद हल्की वॉक करें।
कब डॉक्टर से मिलें?
यदि:
दो सप्ताह से अधिक कब्ज रहे
खून आए
तेज दर्द हो
वजन अचानक घटे
तो चिकित्सकीय जांच कराएँ।
हाई-प्रोटीन डाइट के फायदे
मसल्स निर्माण
तृप्ति बढ़ना
वजन नियंत्रण
ब्लड शुगर संतुलन
लेकिन संतुलन आवश्यक है।
संतुलित हाई-प्रोटीन डाइट का उदाहरण
सुबह:
अंडे + सब्जी + ओट्स
दोपहर:
दाल + ब्राउन राइस + सलाद
शाम:
ग्रीक योगर्ट + बीज
रात:
पनीर/टोफू + हरी सब्जियाँ
मिथक और सच्चाई
मिथक: प्रोटीन ही कब्ज का कारण है।
सच्चाई: फाइबर और पानी की कमी असली कारण हैं।
मिथक: सप्लीमेंट हमेशा नुकसान करते हैं।
सच्चाई: संतुलन के साथ सुरक्षित हो सकते हैं।
निष्कर्ष
हाई-प्रोटीन डाइट स्वयं कब्ज का सीधा कारण नहीं है, लेकिन यदि वह लो-फाइबर, कम पानी और निष्क्रिय जीवनशैली के साथ जुड़ जाए, तो कब्ज की संभावना बढ़ सकती है।
संतुलन ही समाधान है:
प्रोटीन बढ़ाएँ
फाइबर बनाए रखें
पानी पर्याप्त लें
सक्रिय रहें
फिटनेस और पाचन दोनों साथ चल सकते हैं—बस समझदारी से योजना बनानी होगी।
यदि आप हाई-प्रोटीन डाइट शुरू कर रहे हैं, तो याद रखें:
मजबूत शरीर के लिए स्वस्थ पाचन जरूरी है।














