मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने NEET UG 2025 परीक्षा से संबंधित एक अहम फैसले में उन छात्रों को राहत दी है जो इंदौर और उज्जैन के परीक्षा केंद्रों पर बिजली कटौती के कारण परीक्षा सही से नहीं दे पाए थे। यह फैसला न केवल छात्रों की मेहनत और भविष्य की रक्षा करता है, बल्कि देशभर की प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता और समान अवसर सुनिश्चित करने की दिशा में भी एक मिसाल पेश करता है।
NEET UG परीक्षा, जो कि मेडिकल और डेंटल कॉलेजों में दाखिले के लिए राष्ट्रीय स्तर की एक अत्यंत महत्वपूर्ण परीक्षा है, इस साल 5 मई 2025 को देशभर के लाखों छात्रों ने दी थी। मध्य प्रदेश के इंदौर और उज्जैन के कुछ परीक्षा केंद्रों पर परीक्षा के दौरान गंभीर बिजली कटौती की समस्या सामने आई, जिससे छात्रों को पेपर हल करने में भारी कठिनाई का सामना करना पड़ा। कई छात्रों ने दावा किया कि न तो केंद्र पर बैकअप की व्यवस्था थी और न ही पर्याप्त प्राकृतिक रोशनी, जिससे न केवल उनकी पढ़ाई पर असर पड़ा, बल्कि मानसिक तनाव भी काफी बढ़ गया।
इस मुद्दे को लेकर कुछ अभ्यर्थियों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट में दलील दी कि यह परिस्थिति उनके साथ अन्याय है और वे बराबरी के अवसर से वंचित हो गए हैं। कोर्ट ने याचिका को गंभीरता से लिया और इस पूरे मामले की गहराई से सुनवाई की। अंततः 1 जुलाई 2025 को हाईकोर्ट ने फैसला सुनाते हुए यह निर्देश दिया कि जिन छात्रों ने बिजली कटौती के कारण याचिका दायर की है, उनके लिए NEET UG 2025 की पुनः परीक्षा (रिटेस्ट) आयोजित की जाए।
यह रिटेस्ट केवल उन्हीं छात्रों के लिए मान्य होगा, जिन्होंने समय रहते—यानी 3 जून 2025 तक—याचिका दायर की थी। कोर्ट ने NTA (नेशनल टेस्टिंग एजेंसी) को आदेश दिया है कि वह इन छात्रों के लिए जल्द से जल्द परीक्षा की नई तारीख तय करे और उनकी रैंकिंग को फिर से जोड़ा जाए ताकि उन्हें कॉलेज काउंसलिंग में हिस्सा लेने का पूरा हक मिल सके।
इस मामले में कोर्ट ने यह भी साफ किया कि बाकी सभी छात्रों का रिजल्ट वैध है और काउंसलिंग प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है। केवल उन छात्रों के लिए काउंसलिंग में अस्थायी रोक लगाई गई है जिनका रिटेस्ट होना है। जब उनका रिटेस्ट हो जाएगा और नया स्कोर सामने आ जाएगा, तभी उन्हें मेरिट में शामिल कर उनकी सीटें तय की जाएंगी।
यह फैसला परीक्षा प्रणाली की जवाबदेही और पारदर्शिता के लिए बहुत ही अहम माना जा रहा है। अदालत ने कहा कि NEET जैसी प्रतियोगी परीक्षा, जिसमें लाखों छात्रों का भविष्य जुड़ा होता है, उसमें तकनीकी या प्रशासनिक चूक का असर छात्रों के जीवन पर गहरा पड़ता है। इस वजह से यदि छात्रों के परीक्षा देने के अधिकार पर किसी भी प्रकार का व्यवधान आता है, तो उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
NTA की ओर से यह दलील दी गई थी कि परीक्षा के दौरान बिजली जाने के बाद कुछ समय में बहाल कर दी गई थी और प्राकृतिक रोशनी पर्याप्त थी। परंतु कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि एक राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा में ‘काफी हद तक ठीक’ की बजाय ‘पूरी तरह व्यवस्थित’ का मानक लागू होना चाहिए।
इस निर्णय के बाद छात्र संगठनों और शिक्षाविदों ने हाईकोर्ट के फैसले का स्वागत किया है। उनका मानना है कि इससे परीक्षा में भाग लेने वाले सभी छात्रों में यह संदेश जाएगा कि यदि वे किसी प्रकार के अन्याय या तकनीकी गड़बड़ी के शिकार होते हैं, तो उन्हें भी न्याय मिल सकता है, बशर्ते वे समय रहते अपनी आवाज़ उठाएं।
इस रिटेस्ट की प्रक्रिया अब NTA के सामने एक बड़ी जिम्मेदारी बन गई है। उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि न केवल परीक्षा सही तरीके से दोबारा आयोजित हो, बल्कि संबंधित छात्रों की काउंसलिंग भी उसी तरह से समयबद्ध तरीके से हो, ताकि उनका एडमिशन शेड्यूल प्रभावित न हो। यह भी देखना होगा कि रिटेस्ट में शामिल होने वाले छात्रों की गोपनीयता और निष्पक्षता बनी रहे।
इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर इस बात को उजागर किया है कि भारत में अभी भी परीक्षा केंद्रों की आधारभूत सुविधाओं में सुधार की ज़रूरत है। देशभर में ऐसे कई केंद्र हैं, जहां तकनीकी या आधारभूत समस्याएं जैसे बिजली, इंटरनेट या इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी देखने को मिलती है। अगर सरकार और संबंधित एजेंसियां इस दिशा में ध्यान दें, तो भविष्य में ऐसी घटनाओं से बचा जा सकता है।
छात्रों और उनके अभिभावकों के लिए यह फैसला राहत की सांस जैसा है। यह एक उम्मीद की किरण है उन लाखों छात्रों के लिए जो कठिन मेहनत कर के अपने भविष्य को उज्ज्वल बनाना चाहते हैं। हाईकोर्ट का यह फैसला इस बात का प्रमाण है कि भारतीय न्याय प्रणाली छात्रों के अधिकारों के प्रति संवेदनशील है और वह यह सुनिश्चित करने के लिए कटिबद्ध है कि कोई भी विद्यार्थी किसी तकनीकी कारण से अपने सपनों से वंचित न रह जाए।
अंततः, यह फैसला न केवल इन प्रभावित छात्रों की जीत है, बल्कि यह पूरे देश में एक सकारात्मक संदेश भी है—कि शिक्षा और परीक्षा केवल अंक पाने का माध्यम नहीं, बल्कि एक निष्पक्ष, पारदर्शी और अधिकार-संपन्न प्रक्रिया होनी चाहिए, जहां हर छात्र को बराबरी का मौका मिले।








