2026 में जय एकादशी का पर्व 29 फरवरी को मनाया जाएगा। यह दिन हिन्दू कैलेंडर के अनुसार माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि के समान आता है, यानी चंद्र की ग्यारहवीं स्थिति वाला विशेष दिन जब भगवान के प्रति श्रद्धा और व्रत का महत्व सर्वोपरि होता है। हिंदू धर्मग्रंथों में इस एकादशी को “जय” कहा गया है, क्योंकि यह आत्मा के विजय, पापों पर विजय और मनोबल में वृद्धि के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना जाता है। यह व्रत अन्य एकादशियों की तरह न केवल शरीर के लिए संयम का प्रतीक है, बल्कि मन के अनुशासन, नियंत्रण और आत्मशुद्धि का भी संदेश देता है।
इस एकादशी को मनाने की विधि में प्रातःकाल उठकर स्नान करना, शुद्ध वस्त्र धारण करना और भगवान विष्णु के चित्र या लिंग के सामने दीपक, धूप और पुष्प अर्पित करना शामिल है। व्रत का अर्थ केवल भोजन का त्याग करना ही नहीं है, बल्कि उन विचारों, शब्दों और कर्मों के परित्याग का भी है जो मन को अशान्त या पाप की ओर ले जाते हैं। इस दिन पूरे दिन चंद्रमा के उदय से लेकर रात्रि तक ध्याना, भजन, कीर्तन और शास्त्रीय वाचन की परंपरा है।
व्रत के नियमों के अनुसार, सुबह उठकर तिल, लहसुन, प्याज़, मांस, मद्य आदि से विरत रहना चाहिए। यदि पूर्ण व्रत नहीं रखा जा सकता तो केवल रात और दिन में फल, दूध या हल्का अन्न उपयोग किया जा सकता है। परंतु मूल सिद्धांत है संयम, क्रोध का त्याग, सत्य का पालन और दूसरों के कल्याण के लिए दया भाव रखना। शाम को भगवान विष्णु या श्रीहरि के नाम का जाप करते हुए, तुलसी के पत्तों पर प्रसाद अर्पित करना शुभ माना जाता है।
जय एकादशी की पौराणिक कथा भी बड़ी प्रेरणादायक है। एक समय की बात है कि एक राजा अपने राज्य में सुख और समृद्धि के लिए चिंतित रहता था। उसने अनेक मंत्रियों और गुरुजनों से सलाह ली लेकिन कोई संतोषजनक उत्तर नहीं मिला। अंततः उसे एक मुनि का सन्देश मिला, जिन्होंने कहा कि भगवान की कृपा और आत्मा की शुद्धि के लिए जय एकादशी का व्रत अति महत्वपूर्ण है। राजा ने संकल्प लिया और पूरे विधि विधान के साथ व्रत रखा। उसके जीवन में धीरे-धीरे समृद्धि, शांति और संतुलन लौटा तथा उसके राज्य में भी खुशहाली आई। इसी कथा से यह बात स्पष्ट होती है कि जब मन, वचन और कर्म एकत्र होकर ईश्वर की ओर अग्रसर होते हैं तो जीवन में अकल्पनीय परिवर्तन संभव हो सकता है।
इस एकादशी के व्रत से जुड़े कुछ विशेष लाभ भी बताये गए हैं। कहा जाता है कि इस दिन व्रत रखने से जीवन में आय बढ़ती है, वैवाहिक जीवन में सौहार्द बढ़ता है और मानसिक शांति की प्राप्ति होती है। इसके अलावा, पितृकर्म और पूर्वज-सम्बन्धी बाधाएँ दूर होती हैं तथा व्यक्ति को अपने कर्मों का फल स्पष्ट रूप से देखने का अवसर मिलता है। इस व्रत को रखने से व्यक्ति की आत्मा को शक्ति मिलती है और मनोबल तथा आत्मविश्वास में वृद्धि होती है।
जय एकादशी का आरम्भ तब होता है जब एकादशी तिथि प्रातः उदय से पहले शुरू हो जाती है और द्वादशी के प्रवेश तक समाप्त होती है। इस दौरान यह ध्यान रखना आवश्यक है कि पारण केवल द्वादशी की सुबह सूर्योदय के बाद ही किया जाए। पारण के समय तुलसी के पादुका, तिल, नमक और हल्का भोजन ग्रहण करने की परंपरा है। इस पारण को बहुत शुभ माना जाता है क्योंकि यह व्रत का समापन तो दर्शाता ही है, साथ ही नए प्रारंभ की राह भी प्रशस्त करता है।
धार्मिक ग्रंथों में यह भी कहा गया है कि जय एकादशी का पालन करने से व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति के लिए मार्ग मिल सकता है। मोक्ष का आशय केवल मृत्यु के बाद मुक्ति ही नहीं है, बल्कि सांसारिक जीवन में पापों से मुक्ति, मन की स्पष्टता और अंतर्मन की शांति को प्राप्त करने का भी मार्ग है। यह व्रत आत्मनिरीक्षण का एक अवसर है, जहां व्यक्ति स्वयं से प्रश्न करता है कि उसके जीवन में क्या गलत आदतें हैं, कौन से कर्म उसे आगे बढ़ने से रोकते हैं और किन बातों पर संकल्प आधारित सुधार की आवश्यकता है।
जय एकादशी का महत्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान के रूप में नहीं है, बल्कि यह सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं में भी गहराई से जुड़ा हुआ है। यह व्रत परिवारों में आनंद, मिलनसारिता और सामूहिक सोच को भी बढ़ावा देता है। कई परिवार मिलकर भजन-कीर्तन का आयोजन करते हैं, जहाँ बच्चे, बूढ़े और युवा साथ बैठ कर भगवान के नाम का स्मरण करते हैं। इससे उन परिवारों के बीच सद्भाव और प्यार की भावना भी पैदा होती है, जो आज के तेज-तर्रार जीवन में बहुत आवश्यक है।
शास्त्रों में यह भी उल्लेख है कि जय एकादशी उन लोगों के लिए भी अत्यंत लाभकारी होती है जो शिक्षा, नौकरी या व्यवसाय में किसी कठिनाई का सामना कर रहे हैं। यह व्रत मन की एकाग्रता बढ़ाता है और व्यक्ति को अपने लक्ष्य के प्रति अधिक समर्पित रहने की शक्ति प्रदान करता है। जब व्यक्ति अपने मन से नकारात्मक विचारों को निकाल देता है और सकारात्मक ऊर्जा को अपनाता है, तो जीवन के हर क्षेत्र में सफलता के मार्ग खुलते हैं।
आध्यात्मिक गुरुओं का यह कहना है कि इस दिन की रात में विशेष ध्यान और जप करना अत्यंत फलदायी होता है। आम तौर पर भजन-कीर्तन, गुरु मंत्र का जाप और ध्यान साधना इस रात को और भी अधिक शुभ बनाते हैं। कई लोग रात में जागरण कर भगवान की आराधना करते हैं और पूरे दिन व्रत के दौरान सकारात्मक ऊर्जा का संचार अनुभव करते हैं।
जय एकादशी जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने का एक अवसर है। यह व्रत केवल एक धार्मिक कर्तव्य नहीं है, बल्कि जीवन के सभी पहलुओं में सुधार की प्रेरणा देता है। संयम, शांति, भक्ति और सेवा भाव को आत्मसात करने का यह अवसर है। यदि व्यक्ति संपूर्ण श्रद्धा, निष्ठा और शुद्ध मन से यह व्रत रखता है, तो जीवन में अनेक अंधकारमय स्थितियाँ प्रकाश में बदल सकती हैं।
निष्कर्ष:
जय एकादशी 2026 का दिन भक्ति, अनुशासन और आध्यात्मिक शुद्धि का प्रतीक है। यह व्रत हमें हमारी आत्मा की ओर लौटने का मार्ग दिखाता है, साथ ही जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने का अवसर भी प्रदान करता है। यह दिन मन की स्पष्टता, जीवन में संतुलन और भक्ति के माध्यम से नई ऊर्जा प्राप्त करने का अवसर है। इसे श्रद्धा और विश्वास के साथ मनाने से जीवन में सु ख, शांति और समृद्धि आने की संभावनाएँ बहुत अधिक होती हैं। जय एकादशी का व्रत सिर्फ धर्म नहीं, बल्कि जीवन की दिशा बदलने वाला अनुभव भी है।








