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Tuesday, February 3, 2026 12:31 pm

बवासीर (पाइल्स): कारण, लक्षण, प्रकार और बचाव की पूरी जानकारी

बवासीर, जिसे आम भाषा में पाइल्स कहा जाता है, आज के समय में एक बेहद आम लेकिन अक्सर नज़रअंदाज़ की जाने वाली स्वास्थ्य समस्या बन चुकी है। बदलती जीवनशैली, गलत खान-पान, शारीरिक गतिविधि की कमी और लंबे समय तक कब्ज जैसी आदतों के कारण बवासीर के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। यह समस्या किसी एक उम्र या वर्ग तक सीमित नहीं है, बल्कि बच्चे, युवा, महिलाएँ और बुजुर्ग—सभी इससे प्रभावित हो सकते हैं।

बवासीर को लेकर सबसे बड़ी समस्या यह है कि लोग इसे शर्म या झिझक के कारण छुपाने की कोशिश करते हैं। कई लोग तब तक डॉक्टर से संपर्क नहीं करते, जब तक समस्या गंभीर न हो जाए। नतीजा यह होता है कि एक साधारण-सी शुरुआत धीरे-धीरे दर्द, खून आने, संक्रमण और मानसिक तनाव जैसी जटिल स्थितियों में बदल जाती है।

वास्तव में, बवासीर कोई अचानक होने वाली बीमारी नहीं है। यह धीरे-धीरे विकसित होती है और अक्सर लंबे समय तक बनी कब्ज, ज़ोर लगाकर शौच करने की आदत, फाइबर की कमी और गलत दिनचर्या का परिणाम होती है। सही जानकारी और समय पर ध्यान देने से न केवल बवासीर से बचा जा सकता है, बल्कि शुरुआती अवस्था में इसे बिना सर्जरी के भी नियंत्रित किया जा सकता है।

बवासीर (पाइल्स) क्या है?

बवासीर, जिसे चिकित्सकीय भाषा में पाइल्स (Piles) कहा जाता है, गुदा (एनस) और मलाशय (रेक्टम) से जुड़ी एक स्थिति है, जिसमें वहाँ मौजूद नसें असामान्य रूप से फूल जाती हैं या सूज जाती हैं। जब ये सूजी हुई नसें गांठ या मस्से का रूप ले लेती हैं, तो उसे बवासीर कहा जाता है। ये मस्से कभी मलाशय के अंदर होते हैं और कभी गुदा के बाहर दिखाई देते हैं।

सामान्य स्थिति में गुदा और मलाशय की नसें मल त्याग की प्रक्रिया को नियंत्रित करने में मदद करती हैं। लेकिन जब इन नसों पर लंबे समय तक लगातार दबाव पड़ता है—जैसे कि कब्ज के कारण ज़ोर लगाकर शौच करना—तो वे अपनी सामान्य अवस्था खो देती हैं। यही दबाव धीरे-धीरे नसों को कमजोर करता है और उनमें सूजन आ जाती है, जो आगे चलकर बवासीर का रूप ले लेती है।

आसान शब्दों में समझें तो, बवासीर कोई अलग से बनने वाली गांठ नहीं होती, बल्कि यह गुदा की नसों की बीमारी है। जैसे पैरों में वैरिकोज़ वेन्स में नसें फूल जाती हैं, उसी तरह बवासीर में गुदा और मलाशय की नसें फूल जाती हैं।

बवासीर शुरू में बहुत हल्की हो सकती है और कभी-कभी केवल शौच के समय हल्का खून आना ही इसका संकेत होता है। लेकिन समय पर ध्यान न दिया जाए तो यही समस्या दर्द, जलन, खुजली, सूजन और दैनिक जीवन में भारी परेशानी का कारण बन सकती है। इसलिए यह समझना ज़रूरी है कि बवासीर केवल एक अस्थायी असुविधा नहीं, बल्कि एक ऐसी स्थिति है जिसे समय रहते पहचानना और संभालना आवश्यक है।

बवासीर होने के मुख्य कारण

बवासीर कोई अचानक होने वाली बीमारी नहीं है, बल्कि यह धीरे-धीरे विकसित होने वाली समस्या है। इसके पीछे कई कारण होते हैं, जिनमें से अधिकांश हमारी गलत आदतों, जीवनशैली और खान-पान से जुड़े होते हैं। जब गुदा और मलाशय की नसों पर लगातार दबाव पड़ता है, तो वे सूजने लगती हैं और यही स्थिति आगे चलकर बवासीर का रूप ले लेती है।

नीचे बवासीर होने के सभी प्रमुख कारणों को विस्तार से समझाया गया है।


3.1 लंबे समय तक कब्ज रहना

बवासीर का सबसे बड़ा और सबसे आम कारण कब्ज माना जाता है। जब मल कठोर और सूखा हो जाता है, तो उसे बाहर निकालने के लिए व्यक्ति को ज़ोर लगाना पड़ता है। यह ज़ोर सीधे गुदा की नसों पर दबाव डालता है।

लगातार कब्ज रहने पर:

  • नसें कमजोर होने लगती हैं

  • सूजन बढ़ती जाती है

  • धीरे-धीरे मस्से बनने लगते हैं

कई मामलों में देखा गया है कि जिन लोगों को वर्षों से कब्ज की समस्या होती है, उनमें बवासीर का खतरा काफी अधिक होता है।


3.2 शौच के समय ज़ोर लगाना

कई लोग शौच के समय जरूरत से ज्यादा ज़ोर लगाते हैं, चाहे मल त्याग की पूरी इच्छा न भी हो। यह आदत गुदा और मलाशय की नसों के लिए बेहद नुकसानदायक होती है।

बार-बार ज़ोर लगाने से:

  • नसों पर असामान्य दबाव पड़ता है

  • नसें फैलने लगती हैं

  • सूजन और दर्द बढ़ता है

यह स्थिति धीरे-धीरे स्थायी रूप ले सकती है।


3.3 फाइबर की कमी वाला भोजन

फाइबर मल को नरम बनाता है और आंतों की गति को बेहतर करता है। जब आहार में फाइबर की कमी होती है, तो मल कठोर हो जाता है और कब्ज की समस्या बढ़ती है।

फाइबर की कमी के मुख्य कारण:

  • फल और सब्ज़ियाँ कम खाना

  • साबुत अनाज की जगह मैदा खाना

  • जंक और प्रोसेस्ड फूड का अधिक सेवन

यह आदत बवासीर की जड़ बन सकती है।


3.4 पानी कम पीना

शरीर में पानी की कमी होने पर आंतें मल से अधिक पानी सोख लेती हैं, जिससे मल सूख जाता है। सूखा मल बाहर निकालना कठिन होता है और ज़ोर लगाना पड़ता है।

पर्याप्त पानी न पीने से:

  • कब्ज बढ़ती है

  • शौच में कठिनाई होती है

  • बवासीर का खतरा कई गुना बढ़ जाता है


3.5 लंबे समय तक टॉयलेट में बैठना

आजकल मोबाइल फोन या अखबार लेकर टॉयलेट में देर तक बैठना एक आम आदत बन गई है। यह आदत बेहद हानिकारक है।

लंबे समय तक बैठने से:

  • गुदा की नसों पर लगातार दबाव रहता है

  • रक्त संचार प्रभावित होता है

  • बवासीर बनने की संभावना बढ़ जाती है


3.6 गर्भावस्था और प्रसव

गर्भावस्था के दौरान बढ़ता हुआ गर्भाशय मलाशय की नसों पर दबाव डालता है। इसके अलावा हार्मोनल बदलाव और कब्ज भी बवासीर का कारण बन सकते हैं।

प्रसव के समय:

  • अत्यधिक ज़ोर लगाना पड़ता है

  • नसों पर अचानक दबाव बढ़ता है

इसी कारण गर्भवती और हाल ही में माँ बनी महिलाओं में बवासीर आम देखी जाती है।


3.7 मोटापा

अधिक वजन होने से पेट और मलाशय के निचले हिस्से पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। यह दबाव गुदा की नसों को कमजोर कर सकता है।

मोटापे के साथ:

  • कब्ज की संभावना बढ़ती है

  • शारीरिक गतिविधि कम होती है

  • बवासीर का खतरा अधिक रहता है


3.8 लंबे समय तक बैठकर काम करना

ऑफिस में लंबे समय तक बैठना, ड्राइविंग या लगातार एक ही मुद्रा में रहना रक्त संचार को प्रभावित करता है।

इससे:

  • गुदा क्षेत्र में रक्त जमा होने लगता है

  • नसों में सूजन बढ़ती है

  • बवासीर बनने की संभावना बढ़ जाती है


3.9 शारीरिक गतिविधि की कमी

व्यायाम की कमी से पाचन तंत्र सुस्त हो जाता है और कब्ज की समस्या बढ़ जाती है।

निष्क्रिय जीवनशैली:

  • आंतों की गति धीमी करती है

  • मल त्याग में कठिनाई पैदा करती है

  • बवासीर को जन्म देती है


3.10 बढ़ती उम्र

उम्र बढ़ने के साथ शरीर की नसें और मांसपेशियाँ कमजोर होने लगती हैं। मलाशय की नसें भी इसका अपवाद नहीं हैं।

बुजुर्गों में:

  • कब्ज आम होती है

  • दवाओं का सेवन अधिक होता है

  • बवासीर का खतरा बढ़ जाता है

बवासीर के प्रकार (Types of Piles)

बवासीर एक ही तरह की बीमारी नहीं होती, बल्कि यह विभिन्न प्रकारों में पाई जाती है। बवासीर के प्रकार इस बात पर निर्भर करते हैं कि सूजी हुई नसें कहाँ स्थित हैं, उनसे खून आता है या नहीं, और वे कितनी गंभीर अवस्था में हैं। सही इलाज और देखभाल के लिए बवासीर के प्रकारों को समझना बेहद ज़रूरी है।

नीचे बवासीर के सभी प्रमुख प्रकारों को सरल भाषा में विस्तार से समझाया गया है।


4.1 आंतरिक बवासीर (Internal Piles)

आंतरिक बवासीर मलाशय (रेक्टम) के अंदर होती है। यह सबसे आम प्रकार की बवासीर मानी जाती है और शुरुआत में अक्सर दर्दरहित होती है, इसलिए कई लोग इसे लंबे समय तक पहचान नहीं पाते।

मुख्य विशेषताएँ:

  • मलाशय के अंदर स्थित होती है

  • शुरुआती अवस्था में दर्द नहीं होता

  • अक्सर केवल खून आने से ही पता चलता है

लक्षण:

  • शौच के समय या बाद में चमकीला लाल खून आना

  • बिना दर्द के रक्तस्राव

  • शौच के बाद भी हल्की असहजता

क्यों खतरनाक हो सकती है:
चूंकि इसमें दर्द नहीं होता, लोग इसे नज़रअंदाज़ कर देते हैं। लंबे समय तक खून आने से खून की कमी (एनीमिया) हो सकती है।


4.2 बाहरी बवासीर (External Piles)

बाहरी बवासीर गुदा (एनस) के बाहर होती है और यह सबसे दर्दनाक प्रकार मानी जाती है। इसमें सूजी हुई नसें बाहर से दिखाई देती हैं या उँगली से महसूस की जा सकती हैं।

मुख्य विशेषताएँ:

  • गुदा के बाहर होती है

  • सूजन और दर्द अधिक होता है

  • बैठने और चलने में परेशानी

लक्षण:

  • गुदा के आसपास गांठ या मस्सा

  • शौच करते समय या बैठते समय दर्द

  • खुजली, जलन और सूजन

रोज़मर्रा पर असर:
बाहरी बवासीर व्यक्ति के दैनिक जीवन को सबसे अधिक प्रभावित करती है, क्योंकि दर्द लगातार बना रह सकता है।


4.3 रक्तस्रावी बवासीर (Bleeding Piles)

इस प्रकार की बवासीर में शौच के दौरान खून आना मुख्य लक्षण होता है। यह आमतौर पर आंतरिक बवासीर से जुड़ी होती है, लेकिन कभी-कभी बाहरी बवासीर में भी रक्तस्राव हो सकता है।

मुख्य विशेषताएँ:

  • मल के साथ खून आना

  • खून का रंग आमतौर पर चमकीला लाल होता है

  • कभी-कभी लगातार रक्तस्राव

संभावित खतरे:

  • खून की कमी (एनीमिया)

  • कमजोरी और चक्कर

  • थकान और सांस फूलना

महत्वपूर्ण चेतावनी:
हर बार शौच में खून आना केवल बवासीर ही नहीं होता। ऐसी स्थिति में डॉक्टर से जांच कराना ज़रूरी होता है।


4.4 शुष्क बवासीर (Dry Piles)

शुष्क बवासीर में खून नहीं आता, लेकिन दर्द, जलन और खुजली अधिक होती है। इसे अक्सर लोग हल्की समस्या समझकर टाल देते हैं, लेकिन यह भी काफी तकलीफदेह हो सकती है।

मुख्य विशेषताएँ:

  • रक्तस्राव नहीं होता

  • सूजन और दर्द प्रमुख लक्षण

  • जलन और खुजली बनी रहती है

लक्षण:

  • शौच के समय जलन

  • बैठने में असहजता

  • गुदा के आसपास सूजन


4.5 बवासीर के चरण (Stages of Piles – संक्षेप परिचय)

बवासीर को गंभीरता के आधार पर चार चरणों में भी बाँटा जाता है:

  • पहला चरण: हल्की सूजन, कभी-कभी खून

  • दूसरा चरण: शौच के समय मस्से बाहर आना और खुद अंदर चले जाना

  • तीसरा चरण: मस्सों को हाथ से अंदर करना पड़ता है

  • चौथा चरण: मस्से हमेशा बाहर रहते हैं और दर्द बहुत अधिक होता है

जैसे-जैसे चरण बढ़ता है, इलाज भी अधिक जटिल होता जाता है।

बवासीर के प्रमुख लक्षण

बवासीर के लक्षण व्यक्ति की स्थिति, बवासीर के प्रकार और उसकी गंभीरता पर निर्भर करते हैं। शुरुआत में लक्षण हल्के हो सकते हैं और कई बार व्यक्ति उन्हें नज़रअंदाज़ कर देता है। लेकिन जैसे-जैसे समस्या बढ़ती है, लक्षण भी स्पष्ट और परेशान करने वाले हो जाते हैं। समय रहते इन लक्षणों को पहचान लेना बेहद ज़रूरी है, ताकि बवासीर को गंभीर अवस्था में पहुँचने से रोका जा सके।

नीचे बवासीर के सभी प्रमुख लक्षणों को विस्तार से समझाया गया है।


5.1 शौच के समय या बाद में खून आना

यह बवासीर का सबसे आम और पहचानने योग्य लक्षण है।

  • आमतौर पर खून चमकीले लाल रंग का होता है

  • खून मल के साथ या टॉयलेट सीट पर दिखाई दे सकता है

  • अक्सर दर्द नहीं होता, खासकर आंतरिक बवासीर में

लगातार खून आने को कभी भी नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे खून की कमी हो सकती है।


5.2 गुदा में दर्द या जलन

बाहरी बवासीर या गंभीर अवस्था में आंतरिक बवासीर में दर्द महसूस हो सकता है।

  • शौच के समय दर्द बढ़ जाता है

  • लंबे समय तक बैठने पर जलन

  • कभी-कभी लगातार चुभन महसूस होती है

यह दर्द दैनिक जीवन को काफी प्रभावित कर सकता है।


5.3 गुदा के आसपास सूजन या मस्से

बाहरी बवासीर में गुदा के बाहर:

  • गांठ या मस्से दिखाई दे सकते हैं

  • सूजन और कठोरता महसूस होती है

  • हाथ लगाने पर दर्द हो सकता है

यह लक्षण बवासीर को स्पष्ट रूप से दर्शाता है।


5.4 खुजली और असहजता

गुदा के आसपास लगातार:

  • खुजली

  • नमी

  • जलन

महसूस होना भी बवासीर का संकेत हो सकता है। खुजली के कारण त्वचा पर घाव भी बन सकते हैं।


5.5 शौच के बाद भी पेट साफ न लगना

कई लोगों को शौच के बाद भी यह महसूस होता है कि पेट पूरी तरह साफ नहीं हुआ।

  • बार-बार शौच की इच्छा

  • अधूरापन महसूस होना

यह लक्षण अक्सर आंतरिक बवासीर और कब्ज के साथ जुड़ा होता है।


5.6 बैठने और चलने में परेशानी

जब बवासीर बढ़ जाती है, तो:

  • लंबे समय तक बैठना मुश्किल हो जाता है

  • चलने-फिरने में दर्द महसूस होता है

  • काम करने की क्षमता कम हो जाती है

यह लक्षण विशेष रूप से बाहरी और उन्नत बवासीर में देखने को मिलता है।


5.7 गुदा से मस्सों का बाहर आना

बवासीर के बढ़े हुए चरणों में:

  • शौच के समय मस्से बाहर आ सकते हैं

  • शुरुआती चरण में वे अपने आप अंदर चले जाते हैं

  • गंभीर अवस्था में हाथ से अंदर करने पड़ते हैं या हमेशा बाहर रहते हैं

यह संकेत बवासीर के बढ़ने का स्पष्ट प्रमाण है।


5.8 बार-बार कब्ज होना

हालाँकि कब्ज बवासीर का कारण भी है और लक्षण भी।

  • कठोर मल

  • ज़ोर लगाकर शौच

  • अनियमित शौच आदतें

ये सभी बवासीर के लक्षणों को और बढ़ा देते हैं।


महत्वपूर्ण बात

हर बार गुदा से खून आना केवल बवासीर ही नहीं होता। कभी-कभी यह:

  • फिशर

  • संक्रमण

  • अन्य गंभीर आंतों की बीमारियों

का संकेत भी हो सकता है। इसलिए सही जाँच बेहद आवश्यक है।

बवासीर के चरण (Stages of Piles)

बवासीर केवल होने या न होने की समस्या नहीं है, बल्कि यह धीरे-धीरे बढ़ने वाली बीमारी है, जिसके अलग-अलग चरण (Stages) होते हैं। इन चरणों को समझना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि हर चरण में लक्षण, परेशानी और इलाज अलग-अलग होता है। यदि शुरुआती चरण में पहचान हो जाए, तो बवासीर को बिना सर्जरी के भी नियंत्रित किया जा सकता है।

चिकित्सकीय रूप से बवासीर को सामान्यतः चार चरणों में बाँटा जाता है।


6.1 पहला चरण (First Degree Piles)

यह बवासीर की शुरुआती अवस्था होती है और अक्सर इसी चरण में लोग इसे नज़रअंदाज़ कर देते हैं।

क्या होता है:

  • मस्से मलाशय के अंदर ही रहते हैं

  • बाहर से दिखाई नहीं देते

  • दर्द आमतौर पर नहीं होता

लक्षण:

  • शौच के समय हल्का खून आना

  • कभी-कभी जलन या असहजता

  • कब्ज की समस्या

खास बात:
इस चरण में बवासीर को केवल खान-पान और जीवनशैली सुधार से ही काफी हद तक ठीक किया जा सकता है।


6.2 दूसरा चरण (Second Degree Piles)

इस चरण में बवासीर थोड़ा बढ़ जाती है और लक्षण अधिक स्पष्ट होने लगते हैं।

क्या होता है:

  • शौच के समय मस्से बाहर आ सकते हैं

  • शौच के बाद अपने आप अंदर चले जाते हैं

लक्षण:

  • खून आना अधिक बार

  • हल्का दर्द या जलन

  • गुदा में भारीपन महसूस होना

ध्यान देने योग्य:
यदि इस चरण में भी इलाज न किया जाए, तो बवासीर आगे बढ़ सकती है।


6.3 तीसरा चरण (Third Degree Piles)

यह बवासीर की गंभीर अवस्था मानी जाती है।

क्या होता है:

  • मस्से शौच के समय बाहर आ जाते हैं

  • अपने आप अंदर नहीं जाते

  • हाथ से अंदर करना पड़ता है

लक्षण:

  • दर्द और जलन

  • सूजन

  • बैठने और चलने में परेशानी

  • कभी-कभी लगातार रक्तस्राव

इलाज की ज़रूरत:
इस चरण में केवल घरेलू उपाय पर्याप्त नहीं होते। डॉक्टर की सलाह और चिकित्सा उपचार ज़रूरी हो जाता है।


6.4 चौथा चरण (Fourth Degree Piles)

यह बवासीर की सबसे गंभीर और जटिल अवस्था होती है।

क्या होता है:

  • मस्से हमेशा बाहर रहते हैं

  • हाथ से भी अंदर नहीं जाते

  • संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है

लक्षण:

  • तेज़ और लगातार दर्द

  • सूजन और जलन

  • अधिक रक्तस्राव

  • दैनिक जीवन बहुत प्रभावित

महत्वपूर्ण:
इस चरण में अक्सर सर्जरी या आधुनिक चिकित्सा प्रक्रिया की आवश्यकता पड़ती है।


बवासीर के चरण क्यों समझना ज़रूरी है?

  • सही समय पर सही इलाज चुनने के लिए

  • सर्जरी से बचने के लिए

  • जटिलताओं को रोकने के लिए

  • समस्या को गंभीर होने से पहले नियंत्रित करने के लिए

बवासीर से होने वाली समस्याएँ

यदि बवासीर को समय पर पहचाना और सही तरीके से नियंत्रित न किया जाए, तो यह केवल दर्द या खून आने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि कई गंभीर शारीरिक और मानसिक समस्याओं को जन्म दे सकती है। शुरुआत में हल्की लगने वाली यह समस्या धीरे-धीरे व्यक्ति के दैनिक जीवन, कार्यक्षमता और मानसिक संतुलन को प्रभावित करने लगती है।

नीचे बवासीर से होने वाली प्रमुख समस्याओं को विस्तार से समझाया गया है।


7.1 गुदा में दरार (एनल फिशर)

लगातार कब्ज और कठोर मल के कारण गुदा की त्वचा फट सकती है, जिससे दरार बन जाती है।

समस्याएँ:

  • शौच के समय तेज़ दर्द

  • जलन और चुभन

  • खून आना

  • शौच जाने का डर

फिशर के कारण लोग शौच रोकने लगते हैं, जिससे कब्ज और बवासीर—दोनों और बिगड़ जाती हैं।


7.2 अत्यधिक रक्तस्राव

बवासीर, विशेषकर रक्तस्रावी बवासीर में, शौच के दौरान बार-बार खून आ सकता है।

परिणाम:

  • शरीर में खून की कमी

  • कमजोरी

  • चक्कर आना

  • थकान

लंबे समय तक खून बहने से स्थिति गंभीर हो सकती है।


7.3 खून की कमी (एनीमिया)

लगातार रक्तस्राव होने पर शरीर पर्याप्त मात्रा में खून नहीं बना पाता।

लक्षण:

  • पीली त्वचा

  • सांस फूलना

  • अत्यधिक थकावट

  • ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई

यह समस्या खासकर महिलाओं और बुजुर्गों में अधिक खतरनाक हो सकती है।


7.4 संक्रमण का खतरा

बवासीर के मस्सों में सूजन, नमी और घाव होने से संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है।

संक्रमण होने पर:

  • दर्द और सूजन बढ़ जाती है

  • मवाद बन सकता है

  • बुखार तक आ सकता है

संक्रमण की स्थिति में तुरंत चिकित्सकीय उपचार आवश्यक होता है।


7.5 लगातार दर्द और असहजता

बवासीर बढ़ने पर व्यक्ति को हर समय:

  • बैठने में परेशानी

  • चलने में दर्द

  • काम करने में असहजता

महसूस हो सकती है। इससे व्यक्ति की कार्यक्षमता और जीवन की गुणवत्ता पर सीधा असर पड़ता है।


7.6 मानसिक तनाव और चिंता

लगातार दर्द, खून आना और शौच से जुड़ा डर व्यक्ति को मानसिक रूप से परेशान कर सकता है।

मानसिक प्रभाव:

  • तनाव और चिंता

  • चिड़चिड़ापन

  • आत्मविश्वास में कमी

  • सामाजिक गतिविधियों से दूरी

कई लोग शर्म के कारण समस्या साझा नहीं करते, जिससे मानसिक दबाव और बढ़ जाता है।


7.7 कब्ज का पुराना रूप लेना

बवासीर और कब्ज एक-दूसरे को बढ़ावा देते हैं।

  • दर्द के डर से शौच रोकना

  • मल और कठोर होना

  • ज़ोर और बढ़ना

इस दुष्चक्र से कब्ज और बवासीर दोनों पुरानी हो सकती हैं।


7.8 जीवन की गुणवत्ता पर असर

बवासीर केवल शारीरिक नहीं, बल्कि जीवनशैली की समस्या बन जाती है।

प्रभाव:

  • काम में मन न लगना

  • नींद में बाधा

  • सामाजिक जीवन प्रभावित

  • लगातार असहजता का अनुभव

बवासीर का निदान (Diagnosis)

बवासीर का सही और समय पर निदान (जाँच) बेहद ज़रूरी है, क्योंकि कई बार इसके लक्षण अन्य गुदा या आंतों से जुड़ी बीमारियों से मिलते-जुलते हो सकते हैं। केवल लक्षणों के आधार पर स्वयं निष्कर्ष निकालना सही नहीं होता। सही जाँच से यह तय किया जा सकता है कि समस्या बवासीर की है या किसी अन्य गंभीर बीमारी की।


8.1 डॉक्टर से कब संपर्क करें

निम्न स्थितियों में डॉक्टर से परामर्श लेना ज़रूरी होता है:

  • शौच के दौरान या बाद में बार-बार खून आना

  • गुदा में लगातार दर्द, सूजन या जलन

  • मस्सों का बाहर दिखाई देना

  • घरेलू उपायों से आराम न मिलना

  • कमजोरी, चक्कर या खून की कमी के लक्षण

समय पर डॉक्टर से मिलने से बीमारी को बढ़ने से रोका जा सकता है।


8.2 चिकित्सकीय इतिहास (Medical History)

निदान की शुरुआत आमतौर पर डॉक्टर द्वारा पूछे गए सवालों से होती है, जैसे:

  • कब से लक्षण शुरू हुए

  • कब्ज कितने समय से है

  • खून कितनी बार और कितना आ रहा है

  • दर्द, जलन या खुजली की स्थिति

  • जीवनशैली और खान-पान की आदतें

यह जानकारी डॉक्टर को समस्या की गंभीरता समझने में मदद करती है।


8.3 शारीरिक जांच (Physical Examination)

डॉक्टर गुदा क्षेत्र की बाहरी जाँच करते हैं ताकि:

  • बाहरी बवासीर

  • सूजन

  • दरार (फिशर)

  • संक्रमण

का पता लगाया जा सके। यह जाँच आमतौर पर सरल और कम समय में हो जाती है।


8.4 डिजिटल रेक्टल एग्ज़ामिनेशन (DRE)

इस जांच में डॉक्टर दस्ताने पहनकर उँगली से मलाशय के अंदर की स्थिति महसूस करते हैं। इससे:

  • आंतरिक बवासीर

  • गांठ या असामान्य सूजन

का अनुमान लगाया जा सकता है। यह जांच थोड़ी असहज हो सकती है, लेकिन जरूरी होती है।


8.5 विशेष जांचें (यदि आवश्यक हों)

कुछ मामलों में डॉक्टर आगे की जांच की सलाह दे सकते हैं, जैसे:

  • एनोस्कोपी: मलाशय के अंदर बवासीर देखने के लिए

  • सिग्मॉयडोस्कोपी या कोलोनोस्कोपी: यदि खून आने का कारण स्पष्ट न हो

  • खून की जांच: एनीमिया (खून की कमी) की पुष्टि के लिए

इन जांचों का उद्देश्य अन्य गंभीर बीमारियों को बाहर करना होता है।


8.6 स्वयं जाँच की गलतियाँ

कई लोग इंटरनेट या दूसरों की बातों के आधार पर खुद ही बवासीर मान लेते हैं, जो गलत हो सकता है।

  • हर बार खून आना बवासीर नहीं होता

  • दर्द का कारण फिशर या संक्रमण भी हो सकता है

इसलिए स्वयं दवा लेने या इलाज शुरू करने से पहले सही निदान आवश्यक है।

बवासीर का इलाज (Treatment Options)

बवासीर का इलाज उसकी अवस्था (चरण), प्रकार और लक्षणों की गंभीरता पर निर्भर करता है। अच्छी बात यह है कि बवासीर के अधिकांश मामलों में सर्जरी की आवश्यकता नहीं होती, खासकर यदि समस्या शुरुआती चरण में पकड़ ली जाए। सही इलाज में आमतौर पर जीवनशैली में बदलाव, दवाएँ और आवश्यकता पड़ने पर चिकित्सकीय प्रक्रियाएँ शामिल होती हैं।

नीचे बवासीर के सभी प्रमुख इलाज विकल्पों को विस्तार से समझाया गया है।


9.1 शुरुआती अवस्था में इलाज (Conservative Treatment)

पहले और दूसरे चरण की बवासीर में अक्सर जीवनशैली और खान-पान में सुधार से ही काफी राहत मिल जाती है।

मुख्य उपाय:

  • कब्ज को नियंत्रित करना

  • मल को नरम रखना

  • शौच के समय ज़ोर न लगाना

  • नियमित दिनचर्या अपनाना

इस अवस्था में सही आदतें अपनाने से बवासीर बढ़ने से रुक सकती है।


9.2 दवाओं से इलाज (Medication)

डॉक्टर बवासीर के लक्षणों के अनुसार कुछ दवाएँ सुझा सकते हैं।

आमतौर पर दी जाने वाली दवाएँ:

  • मल नरम करने वाली दवाएँ – ताकि ज़ोर न लगाना पड़े

  • दर्द निवारक दवाएँ – दर्द और असहजता कम करने के लिए

  • सूजन कम करने वाली क्रीम या सपोसिटरी

  • खुजली और जलन कम करने वाली दवाएँ

⚠️ बिना डॉक्टर की सलाह के लंबे समय तक दवाओं का उपयोग नहीं करना चाहिए।


9.3 घरेलू उपाय (Supportive Home Care)

हालाँकि घरेलू उपाय इलाज का विकल्प नहीं हैं, लेकिन वे लक्षणों से राहत देने में मदद कर सकते हैं।

सामान्य सहायक उपाय:

  • गुनगुने पानी से Sitz Bath लेना

  • पर्याप्त पानी पीना

  • फाइबर युक्त आहार लेना

  • शौच के बाद गुदा क्षेत्र को साफ और सूखा रखना

ये उपाय दवाओं के साथ मिलकर राहत प्रदान कर सकते हैं।


9.4 गैर-सर्जिकल चिकित्सा प्रक्रियाएँ (Minimally Invasive Procedures)

जब दवाओं और जीवनशैली सुधार से आराम न मिले, तब डॉक्टर कुछ आधुनिक प्रक्रियाओं की सलाह दे सकते हैं।

प्रमुख प्रक्रियाएँ:

  • रबर बैंड लिगेशन: मस्से के आधार पर रबर बैंड बाँधकर उसे सुखाया जाता है

  • स्क्लेरोथेरेपी: मस्से में दवा इंजेक्ट कर उसे छोटा किया जाता है

  • इन्फ्रारेड कोएगुलेशन: गर्मी से मस्से को सिकोड़ना

ये प्रक्रियाएँ कम दर्दनाक होती हैं और रिकवरी तेज़ होती है।


9.5 सर्जरी (Surgery)

तीसरे और चौथे चरण की गंभीर बवासीर में, या जब अन्य सभी उपाय विफल हो जाएँ, तब सर्जरी की आवश्यकता पड़ सकती है।

कब सर्जरी की ज़रूरत पड़ती है:

  • लगातार अत्यधिक खून आना

  • मस्से हमेशा बाहर रहना

  • गंभीर दर्द और संक्रमण

  • जीवन की गुणवत्ता बुरी तरह प्रभावित होना

सर्जरी के प्रकार:

  • पारंपरिक सर्जरी

  • आधुनिक लेज़र सर्जरी

आजकल लेज़र तकनीक के कारण सर्जरी पहले की तुलना में कम दर्दनाक और जल्दी ठीक होने वाली हो गई है।


9.6 इलाज के दौरान किन बातों का ध्यान रखें

  • डॉक्टर की सलाह का पालन करें

  • कब्ज दोबारा न होने दें

  • दवाएँ नियमित लें

  • शौच की आदतों में सुधार रखें

  • स्वयं से इलाज बदलने से बचें


बवासीर में क्या खाएँ (Diet for Piles)

बवासीर के इलाज और राहत में खान-पान की भूमिका सबसे अहम होती है। सही आहार न केवल कब्ज को नियंत्रित करता है, बल्कि मल को नरम बनाकर शौच के समय ज़ोर लगने से भी बचाता है। कई मामलों में देखा गया है कि केवल भोजन की आदतें सुधार लेने से ही बवासीर के लक्षण काफी हद तक कम हो जाते हैं।

नीचे बताया गया है कि बवासीर में क्या खाना चाहिए और क्यों


10.1 फाइबर युक्त भोजन

फाइबर बवासीर के मरीज के लिए सबसे ज़रूरी पोषक तत्व है। यह मल को नरम करता है और आंतों की गति को बेहतर बनाता है।

फाइबर युक्त खाद्य पदार्थ:

  • हरी सब्ज़ियाँ (पालक, लौकी, तोरी, गाजर)

  • फल (पपीता, नाशपाती, सेब, अमरूद)

  • साबुत अनाज (दलिया, जौ, ओट्स, ब्राउन राइस)

  • दालें और चना

👉 फाइबर धीरे-धीरे बढ़ाएँ, ताकि गैस या सूजन न हो।


10.2 पर्याप्त पानी और तरल पदार्थ

पानी फाइबर के साथ मिलकर मल को नरम बनाता है। बिना पर्याप्त पानी के फाइबर भी असरदार नहीं होता।

क्या पिएँ:

  • दिन में 8–10 गिलास पानी

  • नारियल पानी

  • छाछ

  • सूप

पर्याप्त तरल पदार्थ लेने से शौच आसान हो जाता है और जलन कम होती है।


10.3 पाचन को सुधारने वाले खाद्य पदार्थ

कुछ खाद्य पदार्थ पाचन तंत्र को शांत रखते हैं और सूजन कम करने में मदद करते हैं।

लाभकारी खाद्य पदार्थ:

  • दही (प्रोबायोटिक)

  • छाछ

  • अंकुरित अनाज

  • उबली सब्ज़ियाँ

ये आंतों के अच्छे बैक्टीरिया को बढ़ाते हैं।


10.4 आयरन और पोषण युक्त भोजन

यदि बवासीर में खून आता है, तो शरीर में आयरन की कमी हो सकती है।

आयरन युक्त खाद्य पदार्थ:

  • हरी पत्तेदार सब्ज़ियाँ

  • अनार

  • चुकंदर

  • गुड़ (सीमित मात्रा में)

यह कमजोरी और थकान से बचाने में मदद करता है।


10.5 हल्का और नियमित भोजन

बवासीर में भारी भोजन से बचना चाहिए।

  • थोड़ी-थोड़ी मात्रा में भोजन करें

  • भोजन समय पर लें

  • रात का खाना हल्का रखें

इससे पाचन पर अतिरिक्त दबाव नहीं पड़ता।

बवासीर में क्या न खाएँ (Foods to Avoid in Piles)

बवासीर की समस्या में जितना ज़रूरी यह जानना है कि क्या खाना चाहिए, उतना ही ज़रूरी यह समझना भी है कि किन चीज़ों से परहेज़ करना चाहिए। गलत खान-पान बवासीर के लक्षणों को बढ़ा सकता है, कब्ज को गंभीर बना सकता है और इलाज की प्रक्रिया को धीमा कर सकता है।

नीचे विस्तार से बताया गया है कि बवासीर में किन खाद्य पदार्थों से बचना चाहिए और क्यों।


11.1 तला-भुना और जंक फूड

तले-भुने और प्रोसेस्ड फूड पचने में भारी होते हैं और कब्ज को बढ़ाते हैं।

परहेज़ करें:

  • समोसा, कचौरी, पकौड़े

  • बर्गर, पिज़्ज़ा, फ्रेंच फ्राइज़

  • चिप्स और पैकेज्ड स्नैक्स

ये खाद्य पदार्थ आंतों की गति को धीमा कर देते हैं और मल को कठोर बना सकते हैं।


11.2 अत्यधिक मसालेदार भोजन

बहुत ज़्यादा मसाले पेट और गुदा क्षेत्र में जलन बढ़ा सकते हैं।

बचें:

  • अधिक मिर्च-मसाला

  • तीखे अचार

  • चटपटी और बहुत तेज़ स्वाद वाली चीज़ें

मसालेदार भोजन से शौच के समय जलन और दर्द बढ़ सकता है।


11.3 मैदा और रिफाइंड फूड

मैदा में फाइबर लगभग नहीं होता, जिससे कब्ज की समस्या बढ़ती है।

परहेज़ करें:

  • सफेद ब्रेड

  • बिस्कुट

  • केक और पेस्ट्री

  • नूडल्स और पास्ता (मैदे से बने)

इनकी जगह साबुत अनाज को प्राथमिकता दें।


11.4 शराब और कैफीन

शराब और कैफीन शरीर को डिहाइड्रेट कर सकते हैं, जिससे मल सूख जाता है।

सीमित या न लें:

  • शराब

  • अधिक चाय

  • अधिक कॉफी

  • एनर्जी ड्रिंक्स

इनसे कब्ज और बवासीर दोनों बिगड़ सकती हैं।


11.5 लाल मांस और भारी प्रोटीन

लाल मांस पचने में कठिन होता है और कब्ज की प्रवृत्ति बढ़ा सकता है।

परहेज़ करें:

  • अधिक मात्रा में मटन या बीफ़

  • बहुत तला हुआ मांस

यदि मांसाहार लेते हैं, तो सीमित मात्रा में और हल्का भोजन करें।


11.6 बहुत अधिक मीठा और शुगर युक्त खाद्य पदार्थ

अत्यधिक शक्कर आंतों के संतुलन को बिगाड़ सकती है।

कम करें:

  • मिठाइयाँ

  • चॉकलेट

  • शुगर ड्रिंक्स

  • केक-पेस्ट्री

बवासीर से बचाव के उपाय (Prevention Tips for Piles)

बवासीर से बचाव इलाज से कहीं अधिक आसान और प्रभावी होता है। सही समय पर जीवनशैली और आदतों में छोटे-छोटे बदलाव करके न केवल बवासीर से बचा जा सकता है, बल्कि दोबारा होने के खतरे को भी काफी हद तक कम किया जा सकता है। चूँकि बवासीर का सीधा संबंध कब्ज, गलत खान-पान और शौच की आदतों से होता है, इसलिए रोकथाम का फोकस इन्हीं बिंदुओं पर होता है।

नीचे बवासीर से बचाव के सभी महत्वपूर्ण उपाय विस्तार से बताए गए हैं।


12.1 कब्ज से बचाव करें

कब्ज बवासीर का सबसे बड़ा कारण है, इसलिए इसका नियंत्रण सबसे ज़रूरी है।

क्या करें:

  • रोज़ समय पर शौच जाएँ

  • मल त्याग की इच्छा को न रोकें

  • फाइबर और पानी का नियमित सेवन करें

जब मल नरम रहेगा, तो ज़ोर लगाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी और नसों पर दबाव कम होगा।


12.2 शौच की सही आदतें अपनाएँ

गलत शौच आदतें बवासीर को जन्म देती हैं।

ध्यान रखें:

  • टॉयलेट में ज़्यादा देर तक न बैठें

  • मोबाइल या अखबार साथ न ले जाएँ

  • ज़ोर लगाकर शौच न करें

शौच को एक प्राकृतिक प्रक्रिया की तरह लें, न कि ज़बरदस्ती की आदत की तरह।


12.3 फाइबर युक्त संतुलित आहार लें

रोज़ाना के भोजन में फाइबर शामिल करना बवासीर से बचाव का सबसे सरल उपाय है।

फाइबर के अच्छे स्रोत:

  • फल और हरी सब्ज़ियाँ

  • साबुत अनाज

  • दालें और अंकुरित अनाज

यह आंतों की गति को सही रखता है।


12.4 पर्याप्त पानी पिएँ

पानी की कमी से मल कठोर हो जाता है।

आदत बनाएँ:

  • दिन में 8–10 गिलास पानी

  • सुबह उठते ही 1–2 गिलास पानी

यह पाचन तंत्र को सक्रिय करता है।


12.5 नियमित व्यायाम और शारीरिक गतिविधि

निष्क्रिय जीवनशैली बवासीर का खतरा बढ़ाती है।

लाभकारी गतिविधियाँ:

  • रोज़ाना टहलना

  • योग और स्ट्रेचिंग

  • हल्का व्यायाम

व्यायाम से पाचन सुधरता है और वजन नियंत्रित रहता है।


12.6 वजन नियंत्रित रखें

अधिक वजन से मलाशय की नसों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है।

क्या करें:

  • संतुलित भोजन लें

  • नियमित शारीरिक गतिविधि रखें

स्वस्थ वजन बवासीर के जोखिम को कम करता है।


12.7 लंबे समय तक बैठने से बचें

लगातार बैठे रहने से गुदा क्षेत्र में रक्त जमा होने लगता है।

सुझाव:

  • हर 30–60 मिनट में खड़े होकर चलें

  • सही बैठने की मुद्रा अपनाएँ

यह रक्त संचार को बेहतर बनाता है।


12.8 तनाव कम करें

तनाव पाचन तंत्र को प्रभावित करता है और कब्ज बढ़ा सकता है।

तनाव कम करने के तरीके:

  • ध्यान और प्राणायाम

  • पर्याप्त नींद

  • दिनचर्या में संतुलन

मानसिक स्वास्थ्य का पाचन से सीधा संबंध होता है।

महिलाओं में बवासीर

महिलाओं में बवासीर एक आम लेकिन कम चर्चा की जाने वाली समस्या है। अक्सर महिलाएँ इसे सामान्य कमजोरी, कब्ज या प्रसव से जुड़ी परेशानी मानकर नज़रअंदाज़ कर देती हैं, जबकि समय पर ध्यान न देने पर यह समस्या गंभीर रूप ले सकती है। महिलाओं में बवासीर के कारण, लक्षण और देखभाल के तरीके कुछ हद तक पुरुषों से अलग होते हैं, इसलिए इसे अलग से समझना ज़रूरी है।


13.1 महिलाओं में बवासीर क्यों अधिक होती है

महिलाओं के जीवन में ऐसे कई शारीरिक और हार्मोनल बदलाव होते हैं जो बवासीर के खतरे को बढ़ा सकते हैं।

मुख्य कारण:

  • हार्मोनल उतार-चढ़ाव

  • कब्ज की समस्या

  • गर्भावस्था और प्रसव

  • शारीरिक गतिविधि की कमी

  • आयरन सप्लीमेंट का सेवन

ये सभी कारण गुदा और मलाशय की नसों पर दबाव बढ़ाते हैं।


13.2 गर्भावस्था के दौरान बवासीर

गर्भावस्था के समय बवासीर का खतरा सबसे अधिक होता है।

कारण:

  • बढ़ता हुआ गर्भाशय मलाशय की नसों पर दबाव डालता है

  • प्रोजेस्टेरोन हार्मोन पाचन को धीमा कर देता है

  • कब्ज की समस्या बढ़ जाती है

लक्षण:

  • शौच के समय दर्द या जलन

  • खून आना

  • गुदा के आसपास सूजन या मस्से

अक्सर गर्भावस्था के अंतिम महीनों में या प्रसव के बाद बवासीर दिखाई देती है।


13.3 प्रसव के बाद बवासीर

प्रसव के दौरान ज़ोर लगाने से गुदा की नसों पर अचानक और अत्यधिक दबाव पड़ता है।

प्रसव के बाद बवासीर के कारण:

  • लंबे समय तक लेबर

  • बार-बार ज़ोर लगाना

  • शरीर की कमजोरी

  • कब्ज

कई महिलाओं में यह समस्या कुछ समय बाद अपने आप कम हो जाती है, लेकिन कुछ में यह बनी रह सकती है।


13.4 मासिक धर्म और हार्मोनल प्रभाव

मासिक धर्म के दौरान हार्मोनल बदलाव पाचन को प्रभावित कर सकते हैं।

प्रभाव:

  • कुछ महिलाओं में कब्ज बढ़ जाती है

  • पेट में भारीपन और गैस

  • बवासीर के लक्षण अस्थायी रूप से बढ़ सकते हैं

इस समय खान-पान और पानी का विशेष ध्यान रखना ज़रूरी होता है।


13.5 महिलाओं के लिए विशेष सावधानियाँ

महिलाओं को बवासीर से बचाव और नियंत्रण के लिए कुछ खास बातों का ध्यान रखना चाहिए।

सावधानियाँ:

  • फाइबर युक्त भोजन नियमित लें

  • पर्याप्त पानी पिएँ

  • कब्ज को हल्के में न लें

  • गर्भावस्था में डॉक्टर की सलाह से ही दवाएँ लें

  • प्रसव के बाद शौच की आदतों पर विशेष ध्यान दें


13.6 कब डॉक्टर से संपर्क करें

महिलाओं को निम्न स्थितियों में तुरंत डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए:

  • गर्भावस्था में लगातार खून आना

  • तेज़ दर्द या सूजन

  • घरेलू उपायों से आराम न मिलना

  • कमजोरी या चक्कर महसूस होना

बच्चों और बुजुर्गों में बवासीर

बवासीर को अक्सर वयस्कों की बीमारी माना जाता है, लेकिन वास्तविकता यह है कि बच्चों और बुजुर्गों में भी यह समस्या देखी जाती है। इन दोनों आयु वर्गों में बवासीर के कारण, लक्षण और देखभाल के तरीके अलग-अलग होते हैं। इसलिए सही समझ और समय पर ध्यान देना बेहद ज़रूरी होता है।


14.1 बच्चों में बवासीर

बच्चों में बवासीर अपेक्षाकृत कम होती है, लेकिन जब होती है तो इसका मुख्य कारण लगभग हमेशा कब्ज होता है। बच्चों में शौच से जुड़ी गलत आदतें और डर इस समस्या को बढ़ा सकते हैं।

बच्चों में बवासीर के प्रमुख कारण

  • फाइबर युक्त भोजन की कमी

  • दूध या जंक फूड का अधिक सेवन

  • पर्याप्त पानी न पीना

  • शौच को रोकने की आदत (स्कूल या बाहर शौच न जाना)

  • शौच के समय डर या दर्द का अनुभव

लक्षण

  • शौच के समय रोना या डरना

  • मल के साथ खून आना

  • पेट दर्द या पेट फूला रहना

  • गुदा के आसपास सूजन या मस्सा (दुर्लभ मामलों में)

माता-पिता के लिए सावधानियाँ

  • बच्चे को जबरदस्ती शौच के लिए न बैठाएँ

  • भोजन में फल, सब्ज़ियाँ और पानी बढ़ाएँ

  • शौच को लेकर डर या सज़ा का माहौल न बनाएँ

  • लंबे समय तक लक्षण रहने पर डॉक्टर से सलाह लें

बच्चों में बवासीर अक्सर सही खान-पान और आदतों में सुधार से ही ठीक हो जाती है।


14.2 बुजुर्गों में बवासीर

बुजुर्गों में बवासीर एक आम समस्या है, क्योंकि उम्र बढ़ने के साथ शरीर की कई प्राकृतिक प्रक्रियाएँ धीमी हो जाती हैं।

बुजुर्गों में बवासीर के प्रमुख कारण

  • पाचन तंत्र की गति धीमी होना

  • लंबे समय से कब्ज की समस्या

  • शारीरिक गतिविधि में कमी

  • कई दवाओं का नियमित सेवन

  • मलाशय की नसों की कमजोरी

लक्षण

  • बार-बार कब्ज

  • शौच के समय खून आना

  • दर्द या जलन

  • बैठने में परेशानी

  • कमजोरी और चक्कर (खून की कमी के कारण)

बुजुर्गों के लिए विशेष सावधानियाँ

  • भोजन में फाइबर धीरे-धीरे बढ़ाएँ

  • नियमित हल्की सैर या व्यायाम करें

  • पानी पीने की आदत बनाए रखें

  • दवाओं के दुष्प्रभावों पर नज़र रखें

  • बार-बार खून आने पर जांच ज़रूर कराएँ

बुजुर्गों में बवासीर को नज़रअंदाज़ करना खतरनाक हो सकता है, क्योंकि इससे एनीमिया, संक्रमण और कमजोरी जैसी समस्याएँ जल्दी विकसित हो सकती हैं।

बवासीर से जुड़ी आम गलतफहमियाँ

बवासीर को लेकर समाज में कई तरह की गलत धारणाएँ और मिथक प्रचलित हैं। इन्हीं गलतफहमियों के कारण लोग या तो बीमारी को हल्के में लेते हैं या फिर बेवजह डर जाते हैं। सही जानकारी न होने से इलाज में देरी होती है और समस्या गंभीर रूप ले सकती है। इसलिए इन गलतफहमियों को दूर करना बेहद ज़रूरी है।

नीचे बवासीर से जुड़ी सबसे आम गलतफहमियाँ और उनकी सच्चाई बताई गई है।


गलतफहमी 1: बवासीर केवल बुजुर्गों को होती है

सच्चाई:
बवासीर किसी भी उम्र में हो सकती है। आजकल गलत खान-पान, बैठी रहने वाली जीवनशैली और कब्ज के कारण युवा, महिलाएँ और यहाँ तक कि बच्चे भी बवासीर से प्रभावित हो रहे हैं।


गलतफहमी 2: बवासीर हमेशा ऑपरेशन से ही ठीक होती है

सच्चाई:
यह सबसे बड़ी गलत धारणा है।

  • शुरुआती और मध्यम अवस्था की बवासीर

  • सही खान-पान

  • जीवनशैली में सुधार

  • दवाओं और साधारण उपचार

से बिना सर्जरी भी नियंत्रित की जा सकती है। सर्जरी केवल गंभीर मामलों में ही आवश्यक होती है।


गलतफहमी 3: शौच में खून आना हमेशा बवासीर ही होता है

सच्चाई:
हर बार खून आना बवासीर का लक्षण नहीं होता। यह

  • गुदा में दरार (फिशर)

  • संक्रमण

  • या अन्य गंभीर आंतों की बीमारियों

का संकेत भी हो सकता है। इसलिए खून आने पर स्वयं निष्कर्ष निकालने के बजाय जाँच कराना ज़रूरी है।


गलतफहमी 4: बवासीर शर्म की बीमारी है

सच्चाई:
बवासीर कोई शर्म की बात नहीं, बल्कि एक सामान्य चिकित्सकीय समस्या है। शर्म या झिझक के कारण इलाज टालना समस्या को और बढ़ा देता है।


गलतफहमी 5: मसालेदार खाना ही बवासीर का एकमात्र कारण है

सच्चाई:
मसालेदार भोजन लक्षण बढ़ा सकता है, लेकिन मुख्य कारण कब्ज, ज़ोर लगाकर शौच करना और गलत जीवनशैली होती है। केवल मसालेदार भोजन को दोष देना सही नहीं है।


गलतफहमी 6: एक बार ठीक हो गई तो बवासीर दोबारा नहीं होती

सच्चाई:
यदि इलाज के बाद भी जीवनशैली और शौच की आदतें नहीं सुधारी गईं, तो बवासीर दोबारा हो सकती है। रोकथाम के उपाय अपनाना हमेशा ज़रूरी होता है।

कब डॉक्टर से तुरंत संपर्क करें

बवासीर के शुरुआती लक्षणों में अक्सर लोग घरेलू उपायों या खान-पान में बदलाव से राहत पा लेते हैं। लेकिन कुछ स्थितियाँ ऐसी होती हैं, जहाँ डॉक्टर से तुरंत संपर्क करना बेहद ज़रूरी हो जाता है। इन संकेतों को नज़रअंदाज़ करना आगे चलकर गंभीर जटिलताओं का कारण बन सकता है।

नीचे उन स्थितियों और लक्षणों को विस्तार से समझाया गया है, जिनमें देरी करना नुकसानदेह हो सकता है।


16.1 लगातार या अत्यधिक खून आना

यदि:

  • शौच के समय बार-बार खून आ रहा हो

  • खून की मात्रा बढ़ती जा रही हो

  • कई दिनों तक रक्तस्राव बंद न हो

तो यह केवल साधारण बवासीर नहीं भी हो सकता। लंबे समय तक खून आने से एनीमिया (खून की कमी) का खतरा बढ़ जाता है।


16.2 तेज़ और असहनीय दर्द

बवासीर में हल्का दर्द सामान्य हो सकता है, लेकिन यदि:

  • दर्द बहुत तेज़ हो

  • बैठना या चलना मुश्किल हो जाए

  • दर्द दवाओं से भी कम न हो

तो यह संक्रमण, थ्रोम्बोस्ड पाइल्स या फिशर का संकेत हो सकता है।


16.3 मस्सों का बाहर आकर वापस न जाना

यदि:

  • मस्से हमेशा बाहर ही रहें

  • हाथ से भी अंदर न जाएँ

  • सूजन और जलन लगातार बनी रहे

तो यह बवासीर के तीसरे या चौथे चरण का संकेत है, जिसमें चिकित्सकीय हस्तक्षेप आवश्यक होता है।


16.4 बुखार, सूजन या मवाद

बवासीर में:

  • बुखार आना

  • गुदा क्षेत्र में अत्यधिक सूजन

  • मवाद या बदबूदार स्राव

संक्रमण के स्पष्ट संकेत हैं। ऐसी स्थिति में तुरंत डॉक्टर को दिखाना ज़रूरी है।


16.5 कमजोरी, चक्कर या सांस फूलना

लगातार खून बहने से शरीर में आयरन की कमी हो सकती है।

संकेत:

  • अत्यधिक थकान

  • चक्कर आना

  • सांस फूलना

  • पीली त्वचा

ये लक्षण खून की कमी की ओर इशारा करते हैं और जाँच आवश्यक होती है।


16.6 घरेलू उपायों से राहत न मिलना

यदि:

  • कई हफ्तों तक उपाय करने के बाद भी सुधार न हो

  • लक्षण बढ़ते जाएँ

  • कब्ज और दर्द नियंत्रित न हो

तो स्वयं इलाज जारी रखने के बजाय डॉक्टर से परामर्श लेना चाहिए।

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