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Friday, February 20, 2026 4:30 am

“मुहर्रम 2025: 6 जुलाई को मनाया जाएगा आशूरा, भारत में तारीख को लेकर भ्रम हुआ खत्म” “Muharram 2025: Ashura to be Observed on July 6 in India, Confusion Over Date Cleared”

2025 में मुहर्रम को लेकर चल रहे भ्रम का अंत हो गया है। भारत में इस्लामी नववर्ष का आरंभ 27 जून से हुआ, जब 26 जून की शाम को मुहर्रम का चांद दिखाई दिया। इस तरह, दसवां दिन यानी आशूरा 6 जुलाई 2025, रविवार को पड़ रहा है। देशभर में मुस्लिम समुदाय इस दिन को इमाम हुसैन की शहादत की याद में बड़े श्रद्धा और दुख के साथ मनाता है।

इस्लामी कैलेंडर चंद्र आधारित होता है, इसलिए हर साल मुहर्रम और अन्य पर्वों की तारीख ग्रेगोरियन कैलेंडर की तुलना में बदलती रहती है। यही वजह है कि कई राज्यों में पहले 7 जुलाई को संभावित तारीख माना जा रहा था, लेकिन चांद के दर्शन के बाद इसे 6 जुलाई को ही मनाया जाना तय हो गया है।

सरकार ने भी इसको लेकर स्पष्टता दी है। केंद्र सरकार और कई राज्य सरकारों ने सार्वजनिक अवकाश की घोषणा कर दी है। हालांकि कुछ राज्यों में पहले से निर्धारित छुट्टियों में बदलाव भी किए गए हैं। उदाहरण के तौर पर, कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश ने रविवार को ही छुट्टी रखी है, जबकि कहीं-कहीं पर भ्रम के चलते सोमवार को भी विशेष छुट्टियों की मांग उठाई जा रही है।

बैंक, सरकारी दफ्तर, और शैक्षणिक संस्थान 6 जुलाई को बंद रहेंगे। लेकिन चूंकि यह दिन रविवार है, इसलिए अधिकतर संस्थान वैसे भी बंद रहते हैं। इसके बावजूद, कुछ निजी स्कूलों और दफ्तरों ने सांप्रदायिक सौहार्द को ध्यान में रखते हुए अपने स्तर पर श्रद्धा के साथ विशेष प्रार्थना सभाएं और सामाजिक कार्यक्रम आयोजित करने का फैसला लिया है।

मुहर्रम का महीना इस्लाम धर्म के चार पवित्र महीनों में से एक है। शिया मुस्लिम समुदाय इसे इमाम हुसैन और उनके अनुयायियों की करबला में दी गई कुर्बानी की याद में मनाता है। वे मातम करते हैं, ताजिए निकालते हैं, नौहा पढ़ते हैं, और इमाम हुसैन की सत्य की राह पर अडिग रहने की मिसाल को याद करते हैं। सुन्नी मुस्लिम समुदाय भी इस दिन रोज़ा रखता है और हज़रत मूसा की फिरौन से मुक्ति को याद करता है।

सुरक्षा को लेकर पुलिस प्रशासन ने भी विशेष योजना बनाई है। लखनऊ, हैदराबाद, मुंबई, भोपाल, कोलकाता जैसे शहरों में जहां बड़ी संख्या में ताजिए निकाले जाते हैं, वहां अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनात किए गए हैं। सड़कों पर बैरिकेडिंग की जा रही है, सीसीटीवी कैमरे और ड्रोन से निगरानी बढ़ा दी गई है, ताकि जुलूस शांति और मर्यादा के साथ निकाले जा सकें।

बड़े शहरों के स्थानीय प्रशासन ने यातायात को लेकर भी दिशा-निर्देश जारी किए हैं। कुछ प्रमुख मार्गों को जुलूस की वजह से अस्थायी रूप से बंद किया जाएगा और वैकल्पिक मार्ग उपलब्ध कराए गए हैं। आवश्यक सेवाओं को प्रभावित न करते हुए जन-सुविधा को ध्यान में रखा गया है।

वहीं, सोशल मीडिया पर इस बार भी मुहर्रम के मौके पर भावुक पोस्ट, कविताएं, और श्रद्धांजलि संदेशों की भरमार देखने को मिल रही है। कई मुस्लिम युवाओं ने वीडियो बनाकर करबला की कहानी को नए स्वरूप में साझा किया है। साहित्य प्रेमी वर्ग ने हुसैनी शायरी और किस्सों को डिजिटल मंचों पर फैलाया है, जिससे नई पीढ़ी तक इतिहास की जानकारी पहुँच सके।

इस साल आशूरा रविवार को होने के कारण श्रद्धालुओं के लिए दिन भर धार्मिक क्रियाओं और आयोजन में भाग लेने की सुविधा होगी। मस्जिदों में विशेष नमाज पढ़ी जाएगी, मजलिसों का आयोजन होगा, और कई जगहों पर खूनदान शिविर और भोजन वितरण भी आयोजित किए जा रहे हैं, जो इस दिन को इंसानियत और बलिदान की भावना से जोड़ते हैं।

कोविड के बाद यह पहला अवसर है जब मुहर्रम पूर्ण रूप से भौतिक उपस्थिति में मनाया जा रहा है। पिछले दो वर्षों में ज्यादातर जगहों पर आयोजन सीमित रहे थे या वर्चुअल माध्यमों से किए गए थे। ऐसे में इस बार श्रद्धालुओं में गहरी भावना और जोश देखने को मिल रहा है। कई संगठन तो करबला से जुड़ी कहानियों पर विशेष नुक्कड़ नाटक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी आयोजन कर रहे हैं।

ध्यान देने वाली बात यह भी है कि करबला की घटना सिर्फ एक धर्म विशेष तक सीमित नहीं है। कई हिंदू और सिख समुदायों के लोग भी इस दिन ताजिए के जुलूस में भाग लेते हैं और इमाम हुसैन की कुर्बानी को मानवता की विजय के रूप में देखते हैं। यह आपसी सौहार्द और सांस्कृतिक विविधता की सबसे सशक्त मिसालों में से एक बन गया है।

देशभर में लोग इस मौके पर शांति, समर्पण और बलिदान की भावना को याद करते हुए अपने अपने तरीकों से श्रद्धा व्यक्त करते हैं। चाहे वह बच्चों को करबला के इतिहास की कहानियाँ सुनाना हो या गरीबों को खाना खिलाना—हर गतिविधि में यही संदेश छिपा होता है कि सच्चाई और न्याय के लिए कुर्बानी देने वाला कभी नहीं मरता।

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि मुहर्रम 2025 भारत में 6 जुलाई, रविवार को आस्था, करुणा और सम्मान के साथ मनाया जाएगा। चांद के अनुसार घोषित यह दिन धार्मिक दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है, और देशभर में शांति, भाईचारे और बलिदान के प्रतीकों के रूप में यह दिन इतिहास में एक और सुनहरा अध्याय जोड़ेगा।

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