भारत और यूरोपीय संघ (EU) ने एक ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौते (Free Trade Agreement — FTA) पर अंतिम रूप दे दिया है, जिसे दोनों पक्षों ने “मदर ऑफ ऑल डील्स” यानी सबसे बड़े व्यापार समझौते के रूप में वर्णित किया है। यह समझौता करीब 20 वर्षों की बातचीत के बाद पूरा हुआ है और वैश्विक व्यापार पर इसके गंभीर सकारात्मक प्रभाव की उम्मीद जताई जा रही है। इससे भारत और यूरोप के बीच आर्थिक सहयोग, बाजार पहुंच, सेवाओं में साझेदारी और श्रम-गतिशीलता जैसी कई क्षेत्रों में नई संभावनाएँ खुलेंगी।
यह समझौता केवल वाहनों या निर्यात-आयात मात्र की बात नहीं है, बल्कि यह लगभग 2 अरब लोगों के लिए एक बड़े आर्थिक क्षेत्र को जोड़ने वाला मिलाजुला बाजार रचता है, जो विश्व की लगभग एक-चौथाई अर्थव्यवस्था का प्रतिनिधित्व करता है। इस व्यापार संधि के कारण EU और भारत दोनों को अपने उद्योगों, सेवाओं और निवेश गंतव्यों को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में अधिक मजबूती से स्थापित करने का अवसर मिलेगा।
समझौते के अंतर्गत भारत और EU के बीच बिलियमिंसली लगभग सभी प्रमुख वस्तुओं पर कस्टम ड्यूटी को घटाया या समाप्त किया जाना है। उदाहरण के लिए, भारत के प्रमुख निर्यात जैसे वस्त्र, चमड़ा, जूते, रत्न-आभूषण, मारिन उत्पाद और मशीनरी पर जीरो टैरिफ (शून्य आयात शुल्क) लागू होने की उम्मीद है, जिससे भारतीय निर्यातकों को यूरोपीय बाजारों में प्रतिस्पर्धी होने का बड़ा लाभ मिलेगा।
इसी तरह EU की ओर से आयात होने वाली जर्मन कारों, वाइन, ऑलिव ऑयल और चिकित्सा उपकरण जैसे सामानों पर भी शुल्क में भारी कटौती की जाएगी, जिससे ये उत्पाद भारतीय बाजार में सस्ते और अधिक पहुंच योग्य हो सकते हैं। इससे उपभोक्ता-स्तर पर विकल्प बढ़ेंगे और कंपनियों को आयात विस्तार का अवसर मिलेगा।
समझौते के एक प्रमुख पहलू में सेवाओं और निवेश में खुलापन भी शामिल है, जिससे भारतीय तकनीकी, वित्तीय और प्रशिक्षण सेवाएँ यूरोप में व्यापक स्तर पर उपलब्ध होंगी। साथ ही दोनों पक्षों ने डिजिटल व्यापार, डेटा प्रवाह, बौद्धिक संपदा अधिकार और सीमा पार सेवाओं के नियमों पर भी सहमति बनाई है जिससे भविष्य के संविदाओं और निवेशों के अवसर और बढ़ेंगे।
बाजार पहुंच का असर केवल व्यापार पर ही नहीं होगा। यह समझौता नौकरी सृजन और श्रम-गतिशीलता पर भी प्रभाव डाल रहा है। यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने इस साझेदारी में भारतीय श्रमिकों के लिए यूरोपीय बाजारों में गतिशीलता (mobility) के अवसरों की संभावनाओं का संकेत दिया है, यानी भले ही पूर्ण-स्तर पर वीज़ा नीतियों में परिवर्तन नहीं हुआ हो, कौशलधारी कामगारों और पेशेवरों के लिए रोजगार-विस्तार की दिशा में नए रास्ते खुल सकते हैं। ऐसा माना जा रहा है कि इससे भारत-EU के बीच श्रमिकों और विशेषज्ञों के मूल दृष्टिकोण में परिवर्तन आ सकता है, जिससे दोनों अर्थव्यवस्थाओं को दीर्घकालिक प्रतिस्पर्धात्मक लाभ मिलेगा।
FTA से जुड़ी यह भी उम्मीद जताई जा रही है कि भारत को विशेष रूप से छोटे व मध्यम उद्योगों (MSMEs) और श्रम-प्रधान क्षेत्रों जैसे वस्त्र, चमड़ा एवं जूते आदि में बड़ा लाभ मिलेगा। इन क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर रोजगार मौजूद हैं और शुल्क में कटौती से इन उत्पादों की मांग में वृद्धि हो सकती है, जिससे भारत में रोजगार और आर्थिक गतिविधियाँ मज़बूत होंगी।
समझौते का एक और बड़ा लाभ यह है कि यह वैश्विक व्यापार संबंधों में संतुलन लाने की कोशिश करता है। पिछले वर्षों में अमेरिका और अन्य देशों की तरफ से निर्यात शुल्क और सुरक्षात्मक नीतियों के कारण भारत और यूरोप को वैकल्पिक बाजारों की तलाश करने की चुनौती मिली थी। इन परिस्थितियों में यह FTA दोनों पक्षों को व्यापार विविधता और भरोसेमंद साझेदारी के मार्ग पर ले जा रहा है।
हालांकि समझौता अभी EU सदस्य देशों, यूरोपीय संसद और भारतीय संसद में पारित होने के प्रक्रियागत चरणों से गुज़रना बाकी है, लेकिन इसके लागू होते ही व्यापार और सेवा क्षेत्र की दिशा में बहुत बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे 2027 के आसपास दो-तरफ़ा व्यापार आंकड़ा और निवेश अनुपात और भी बढ़ सकता है, और भारत की निर्यात वृद्धि में नई गति आएगी।
इस आर्थिक भागीदारी से भारत के निर्यातकों को नई प्रतिस्पर्धात्मक छूट मिलेगी और यूरोपीय उपभोक्ताओं तक भारतीय उत्पादों का बेहतर पहुंच स्थापित होगा, जिससे दोनों अर्थव्यवस्थाओं में लंबी अवधि के विकास और रोजगार के अवसर बढ़ेंगे।
यह समझौता न सिर्फ व्यापार, बल्कि आर्थिक सहयोग, शिक्षा, अनुसंधान और तकनीकी साझेदारियों के विस्तार को भी प्रोत्साहित करेगा और वैश्विक व्यापार ढांचे में भारत-EU के रिश्तों को एक नए स्तर पर ले जाने का मार्ग प्रशस्त करेगा।





