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Sunday, February 1, 2026 2:37 am

UGC Act 2026: UGC 2026 kya hai?

13 जनवरी 2026 को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने “University Grants Commission (Promotion of Equity in Higher Education Institutions) Regulations, 2026” नामक नियमावली अधिसूचित की। यह एक अधिनियम नहीं बल्कि उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति, धर्म, लिंग, विकलांगता आदि के आधार पर भेदभाव रोकने के लिये बनाए गए नए नियम हैं। इन नियमों की पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट में 2019 में फाइल की गई याचिकाएँ (रोहित वेमुला, पायल तडवी आदि के पितृगण द्वारा) शामिल हैं, जहाँ आयोग से भेदभाव उन्मूलन के लिए मजबूत तंत्र बनाने का निर्देश मांगा गया था। इन प्रस्तावित नियमों के अधिसूचना होते ही पुराने 2012 के अस्पष्ट दिशानिर्देशों को बदलकर जातिगत भेदभाव को रोकने पर केंद्रीत एक विस्तृत कार्ययोजना लागू कर दी गई।

उद्देश्य

इस नियमावली का प्रमुख उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों में धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्म-स्थान या विकलांगता के आधार पर होने वाले भेदभाव को पूरी तरह समाप्त करना है। विशेष रूप से अनुसूचित जाति/जनजाति, पिछड़े वर्ग, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) और विकलांगों के प्रति भेदभाव को खत्म करना तथा संस्थानों में सबके बीच पूर्ण समता और समावेशन सुनिश्चित करना इसका लक्ष्य है। इसी उद्देश्य से प्रत्येक उच्च शिक्षा संस्था में समता संबंधी नीति लागू करने की जिम्मेदारी तय की गई है।

मुख्य प्रावधान और नियम

नए नियमावली में उच्च शिक्षा संस्थानों पर कई नई व्यवस्थाएँ अनिवार्य की गई हैं:

  • Equal Opportunity Centre (समता केन्द्र): प्रत्येक विश्वविद्यालय/महाविद्यालय में एक समता केन्द्र स्थापित होगा, जो कमी्युनिटी, प्रशासन और अन्य संगठनों के साथ समन्वय से अल्पसंख्यक एवं पिछड़े वर्गों के हितों की रक्षा करेगा। यह केन्द्र पीड़ितों को कानूनी सहायता प्रदान करने, परामर्श देने और अनुभव साझा करने जैसी सुविधाएँ मुहैया कराएगा। इसे चलाने के लिए संस्थान की प्रशासकीय समिति एक वरिष्ठ प्रोफेसर को समन्वयक नियुक्त करेगी।

  • Equity Committees (समता समिति): प्रत्येक संस्थान के प्रमुख की अध्यक्षता में समता समितियाँ गठित होंगी, जिनमें कुलपति/प्राचार्य, तीन वरिष्ठ प्रोफेसर, एक अन्य कर्मचारी, दो नागरिक समाज के प्रतिनिधि और दो विद्यार्थी सदस्य शामिल होंगे। ये समितियाँ शिक्षा संस्थान में शिकायतों की जांच करेंगी और भेदभाव रोधी नीतियों के पालन पर निगरानी रखेंगी।

  • Equity Squads (समता समूह) एवं Ambassadors (समता दूत): हर संस्थान को छोटे–छोटे समता समूह (Equity Squads) बनाकर कैम्पस में सतत निगरानी रखनी होगी। साथ ही प्रत्येक विभाग, कक्षाओं, छात्रावास आदि में एक-एक ‘समता दूत’ नियुक्त होंगे, जो अपनी इकाई में समान अवसर के लिए कार्य करेंगे और किसी भी उल्लंघन की सूचना केंद्र को देंगे।

  • 24×7 हेल्पलाइन (समता हेल्पलाइन): हर उच्च शिक्षा संस्था में चौबीसों घंटे उपलब्ध रहने वाली समता हेल्पलाइन स्थापित होगी। किसी भी भेदभाव की घटना की सूचना सीधे इस हेल्पलाइन पर दी जा सकेगी, और यदि पीड़ित की पहचान गोपनीय रखने की मांग हो तो उसकी पहचान सुरक्षित रखी जाएगी।

  • प्रशिक्षण एवं जागरूकता: संस्थान नए प्रवेशियों, संकाय और कर्मचारियों को भेदभाव-रोध विषय पर जागरूकता कार्यक्रमों, परिचय शिबिरों और पोस्टर/वीडियो से अवगत कराएगा। प्रत्येक सत्र की शुरुआत में समता संबंधी प्रशिक्षण और सप्ताह भर के सेमिनार आयोजित करना अनिवार्य होगा, ताकि सभी हितधारक इन नियमों से परिचित हों। संस्थान की वेबसाइट पर भी नियमावली व हेल्पलाइन की जानकारी प्रमुखता से उपलब्ध करानी होगी।

  • समयबद्ध कार्यवाही: शिकायत आने पर संस्थान की समता समिति को 24 घंटे के भीतर बैठक बुलानी होगी और 15 कार्यदिवस में जांच रिपोर्ट तैयार करनी है। फिर संस्थान प्रमुख को सात दिनों में रिपोर्ट के आधार पर कार्रवाई करनी होगी। इस प्रकार शिकायतों का निस्तारण पिछले नियमों की तुलना में काफी तेज किया गया है।

  • जवाबदेही और दंड: संस्थान के प्रमुख (उच्च शिक्षा प्रमुख) को ये सारे प्रावधान लागू कराने की जवाबदेही सौंपी गई है। नियमों का उल्लंघन पाए जाने पर आयोग संस्थान पर सख्त कार्रवाई कर सकता है – मान्यता निलंबित करना, सरकारी योजनाओं से बाहर करना या डिग्री देने की अनुमति रद्द करना जैसी कार्रवाई। इस तरह संस्थानों को नियमों के पालन के प्रति मजबूर करने की व्यवस्था की गई है।

इन प्रावधानों को सारांशित रूप में देखें तो नए नियमावली में स्पष्ट परिभाषाएँ, शून्य सहनशीलता की नीति, समता तंत्र तथा त्वरित जांच-प्रक्रिया शामिल है। उदाहरण के लिए, “भेदभाव” की परिभाषा में संवैधानिक अधिकारों की बराबरी बाधित करने वाले सभी कृत्य शामिल किए गए हैं। कुल मिलाकर, हर शिक्षा संस्थान में Equal Opportunity Centre, Equity Committee, Equity Squad/Ambassador, हेल्पलाइन और समयबद्ध कार्यप्रणाली अनिवार्य है।

पुराने UGC अधिनियमों से अंतर

यह नई नियमावली पूर्व के UGC अधिनियमों एवं नियमों से काफी भिन्न है। पुराने UGC अधिनियम 1956 और उससे जुड़े नियम मुख्यतः विश्वविद्यालयों को मान्यता प्रदान करने, अनुदान देने और शिक्षा-मानकों को बनाए रखने पर केंद्रित थे। उनमें जाति या धर्म आधारित भेदभाव विरोधी प्रावधान नहीं थे। UGC के पुराने दिशानिर्देश (जैसे 2012 के ‘छात्र शिकायत निवारण नियम’) काफी जेनरिक थे और उन्होंने स्पष्ट समय-सीमा या इंट्रीग्रिटी तंत्र नहीं दिए थे। नए नियमावली ने 2012 के अस्पष्ट फ्रेमवर्क को बदलकर भेदभाव को विनियामक उल्लंघन घोषित कर दिया है।

मुख्य अंतर यह है कि अब जातिगत भेदभाव विरोधी व्यवस्था को अनिवार्य रूप से संस्थागत किया गया है। पुराने UGC नियमों में भेदभाव के खिलाफ कुछ आरक्षण या कानूनी प्रावधान थे, लेकिन उन्होंने कॉलेज-कैंपस तक शिकायत तंत्र या हेल्पलाइन जैसी व्यवस्थाएँ नहीं बनाई थीं। इस नियमावली में शिकायत की गारंटी, जवाबदेही वगैरह जैसी नई नीतियाँ शामिल की गई हैं। यद्यपि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में उच्च शिक्षा आयोग (HECI) की स्थापना की बात की गई थी, पर वर्तमान नियमावली में ऐसा कोई संरचनात्मक बदलाव नहीं है; यह केवल भेदभाव-रोधी उपायों पर केन्द्रित है।

नई नीतियाँ एवं शिक्षा व्यवस्था में परिवर्तन

इस नियमावली में नई नीतियाँ मुख्यतः शैक्षणिक अनुभव के समावेशीकरण से जुड़ी हैं। हर संस्थान में “समता समावेशी नोडल इकाइयाँ” की स्थापना की गई है – जैसे Equal Opportunity Centre और इसकी समता समितियाँ, जो पहले व्यवस्था में नहीं थीं। समता हेल्पलाइन, ‘समता समूह’ और ‘समता दूत’ जैसी व्यवस्थाएँ भी अति-नयी हैं। इन नीतियों से पाठ्यक्रम या डिग्री प्रणालियों में बदलाव नहीं हुआ है; बल्कि संस्थागत ढाँचे में समावेशिता का नया परत जोड़ा गया है।

विशेष रूप से प्रवेश-निकास या प्रशिक्षण-सत्र के दौरान भेदभाव निरोधी वचन-पत्र (गैर-भेदभाव की शपथ) लेना अनिवार्य हुआ है। साथ ही, संस्थान को समय-समय पर आचरण को लेकर रिपोर्ट प्रकाशित करनी होंगी। परंतु पढ़ाई के पाठ्यक्रम या शिक्षा-व्यवस्था के ढांचे में कोई मूलभूत बदलाव नहीं हुए हैं। यह नयी नियमावली केवल सहानुभूति और संवेदनशीलता बढ़ाने एवं अनुशासनात्मक तंत्र मज़बूत करने पर केंद्रित है।

उच्च शिक्षा प्रणाली पर प्रभाव

नई नियमावली के लागू होने से उच्च शिक्षा संस्थानों में समावेशन को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। इससे अब उन छात्रों/शिक्षकों को अधिकारपूर्ण शिकायत-निवारण तंत्र मिलेगा जिन्हें पूर्व में सामाजिक-पारिवारिक जाति या अन्य कारण से भेदभाव का सामना करना पड़ा। शिकायत आने पर जवाबदेही तय करने वाले ठोस समय-सीमा (24 घंटे में बैठक, 15 कार्यदिवस में जांच) लागू होने से शिकायतों का निपटारा तेज होगा। आयोग ने आश्वासन दिया है कि इन प्रावधानों का दुरुपयोग नहीं होने दिया जाएगा और किसी के साथ भी भेदभाव बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। ऐसे सुधार से छोटे-छोटे कॉलेजों में भी बराबरी का माहौल विकसित करने में मदद मिल सकती है।

दूसरी ओर, आलोचना भी हुई है कि कुछ सामान्य वर्ग के छात्र इन नियमों को उल्टा भेदभाव मान रहे हैं। उन्हें डर है कि अब दोष साबित होने तक आरोपित पर बोझ रहेगा। साथ ही विशेषज्ञों ने चेताया है कि हमारे भिन्न-भिन्न संसाधनों वाले संस्थानों में इतने जटिल तंत्र लागू करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। Times of India के अनुसार, यह एक महत्वपूर्ण नीति बदलाव है पर मुख्य प्रश्न होगा इसे “संघीय रूप से काम चलाने वाली” उच्च शिक्षा व्यवस्था में प्रभावी रूप से लागू करना। कुल मिलाकर, यह नियमावली उच्च शिक्षा में समता सुनिश्चित करने के प्रयास को मजबूत करती है, लेकिन इसके पूर्ण प्रभाव के लिए समय लगेगा और सक्रिय निगरानी-सुधार की आवश्यकता होगी।

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