‘हरिहर वीरमल्लु’ के ट्रेलर लॉन्च इवेंट में अचानक, निर्देशक केवी अनुदीप को मंच से हटाया जाना उस समर की मनमोहक रात में तहलका मचाने वाली घटना बन गई। यह घटना न केवल सिने प्रेमियों के बीच चर्चा का विषय बनी, बल्कि इससे सामाजिक और न्यायिक विमर्श भी शुरू हो गया। कहानी इस कदर दिलचस्प है कि तेलुगु फिल्म इंडस्ट्री जल्द ही इसके प्रभाव में आने की संभावना है।
इवेंट मुंबई या हैदराबाद जैसे बड़े शहर में आयोजित किया गया था और पवन कल्याण की ऐतिहासिक-पीरियॉड फिल्म ‘हरिहर वीरमल्लु’ की फील्ड रिपोर्ट थी। जब अनुदीप मंच पर आकर बोलने ही वाले थे, तभी सुरक्षा कर्मियों ने उन्हें रोक दिया और धीरे-धीरे कतार में पीछे कर चले गए। ठीक उसी क्षण उनका अभिव्यक्त झट था—पहुंचने वाली श्रद्धा और सम्मान का मतलब न निकल सका। लोग चौंक गए, कुछ चुप, कुछ हैरान, कुछ गुस्सा—हर चेहरा कुछ बोल रहा था। कैमरे बुरी तरह पकड़े गए, सुरक्षा कर्मी बड़ी मजबूरी में लगे हुए थे, और निर्देशक अनुदीप का आश्चर्य जबरदस्त था—उनकी आंखों में झलक रहा था दर्द।
घटना की जानकारी एक खबर के जरिए फैलते ही ट्रोलिंग शुरू हो गई। सोशल मीडिया पर तेलुगु भाषी फैंस से लेकर फिल्म जगत के आलोचकों ने टिप्पणी करनी शुरू कर दी। कईयों ने कहा कि यह बिन वजह की अपमानजनक हरकत है, जबकि कुछ जाने-अनजाने में इस तरह की सुरक्षा की जरूरत पर बहस कर रहे हैं। कुछ ने इसे ‘कलात्मक दुनिया में लोकतंत्र की सीमा’ कहना भी शुरू कर दिया।
अनुदीप, जिन्होंने खुद को बैकग्राउंड में रखा है और अपनी चेतना को शब्दों से परे रखने की कोशिश की थी, उन्होंने जब मंच खो दिया तो न सिर्फ उन्होंने अपनी बात खोई, बल्कि कुछ नजरिए सिनेमा में भी बदलते नजर आए। जिस व्यक्ति को दुनिया के सामने प्रस्तुत करके कहानी सुनाई जानी थी, उसे वहां से जाना पड़ा—एक फिल्म की आत्मा यही तो होती है, लेकिन यहां पहलू बदल गया– ‘आवाज़ काट ली गई’। आपके सामने बैठी दुनिया की प्रतिक्रिया और सोशल मीडिया पर उकेरी गई प्रतिक्रियाएं दोनों इसे निर्णायक बना चुकी हैं।
पवित्र भावनाओं से जुड़े इस आयोजन ने इस घटना को अन्य बॉलीवुड-मूल्यांकन वाले आयोजनों से अलग बना दिया। जहां अमिताभ बच्चन या शाहरुख की मौजूदगी में आदर की सीमाएं होती हैं, वहीं अनुदीप जैसे क्रिएटर को मंच से हटाया जाना कहीं अधिक असम्मानजनक दिखा। लोग सोशल मीडिया पर पूछने लगे—‘क्या क्रिएटिविटी के आदर को सार्वजनिक तौर पर ग़ुलाम किया जा सकता है?’ अनुदीप की चुप्पी ही भारी थी—उनकी मुस्कान में गहराई थी, आंखों में सवाल थे, और दिल में ठंडी पीड़ा।
इस घटना ने फिल्म जगत के सुरक्षा मानदंडों पर सवाल खड़ा किया है। एक ओर जहां निर्देशक को मंच पर नहीं रहने देना एक्शन था—वहीं यह नीति भी दर्शाती है कि सुरक्षा दिल को ठंडा करने की बजाए, मानवीय गरिमा को नष्ट कर देती है। इससे इंडस्ट्री के भीतर अन्य निर्माताओं, निर्देशकों और कलाकारों को यह सवाल उठाने की सहज मुलाकात मिली—‘क्या आने वाले आयोजनों में हमारी आवाज़ें बढ़ा कर ही हम अपने सम्मान को बचा पाएंगे?’
सिने आलोचक और शोधकर्ता कह रहे हैं कि यह घटना सिने प्रेमियों के लिए गंभीर रूप से चिंतन का विषय बन चुकी है। दर्शकों ने कहानी को देखने लायक तो माना लेकिन जब निर्देशक की ही उपस्थिति सवालों के घेरे में आ जाए, तो सवाल उठता है कि हमारे आयोजनों में कलाकारों को सम्मान के ढांचे को सुनिश्चित कहा बात कब तक हो सकती है? क्या मंच पर बोलने का अधिकार स्वाभाविक रूप से चला गया है?
एक फिल्मकार का मंच पर खड़ा होना और बात करना कार्यक्रम का दिल होता है, लेकिन अगर सुरक्षा व्यवस्था उसे जगह से हटा देती है, तो इससे घाटा सिर्फ व्यक्तिगत नहीं रहता—यह घातक रूप से फिल्म उद्योग की जड़ों को प्रभावित कर सकता है। फिल्में केवल कलाकारों की ही नहीं—निर्देशकों, लेखनकर्ताओं, तकनीशियनों और कर्मचारियों की साझा मेहनत और संवेदनाओं की आत्मा होती हैं। इनके सम्मान पर चोट एक व्यापक जख्म है।
कुल मिलाकर, ‘हरिहर वीरमल्लु’ की ट्रेलर नाइट में सिर्फ एक फिल्म का नया अध्याय शुरू नहीं हुआ—इसमें एक निर्देशक के सम्मान की दास्तां लिखी गई। यह सिर्फ व्यक्तिगत घटना नहीं, बल्कि जन-स्वीकृति का मसला बन गया, सत्य की पुकार में एक निर्देशक की आवाज़ की रक्षा के लिए। फिल्म प्रेमी, इंडस्ट्री के लोग, सामाजिक विशेषज्ञ और कानूनी जानकार—सभी अब मिलकर इस घटना को सिर्फ एक ट्रेलर लॉन्च से आगे ले जा रहे हैं। कतई व्यक्तिगत घटना से बढ़कर, यह मुद्दा बन चुका है—‘कलाकार के सम्मान को कैसे बचाएं’ और यह सवाल शायद लंबे समय तक फिल्म व आयोजन जगत की बातचीत का केंद्र बनेगा।








