LPG क्या है और इसका महत्व
LPG (लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस) में प्रोपेन और ब्यूटेन जैसे हाइड्रोकार्बन गैसों का मिश्रण होता है। यह मुख्य रूप से खाना पकाने के लिए घरों में और पेट्रोल वाहन के वैकल्पिक ईंधन के रूप में उपयोग होती है। भारत में लगभग 33.15 मिलियन मीट्रिक टन एलपीजी की वार्षिक खपत है और करीब 330 मिलियन (33 करोड़) घरों में यह रसोई गैस के रूप में इस्तेमाल होती है। उज्ज्वला योजना जैसी पहलों से पिछली कुछ वर्षों में एलपीजी कनेक्शन बड़ी संख्या में दिए गए हैं, जिससे ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में इसकी मांग काफी बढ़ी है।
मांग और आपूर्ति का संतुलन
भारत में घरेलू एलपीजी उत्पादन आयात की तुलना में बहुत कम है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार जनवरी 2026 में घरेलू उत्पादन लगभग 1.158 मिलियन टन रहा, जबकि आयात 2.192 मिलियन टन था। कुल मिलाकर भारत की एलपीजी खपत का लगभग 60–65% आयात द्वारा पूरा होता है। 2024 में देश ने करीब 20.5 मिलियन टन एलपीजी आयात किया, जिसमें से 90% से अधिक आपूर्ति मध्य पूर्व के देशों (खासकर फारस की खाड़ी और होरमूज़ जलडमरुमार्ग) से होती है। दूसरी ओर घरेलू उत्पादन देश की कुल मांग का केवल लगभग 35–40% ही पूरा कर पाता है। इसके चलते किसी भी अंतरराष्ट्रीय सप्लाई व्यवधान का असर भारत पर तेज़ी से देखने को मिलता है।
घरेलू खपत में घरेलू रसोई गैस की हिस्सेदारी सबसे अधिक है – लगभग 90% से अधिक सिलेंडर घरेलू उपयोग में जाते हैं। इसलिए सरकार हमेशा घरेलू कनेक्शन को प्राथमिकता देती है। संकट के समय पर वाणिज्यिक उपयोग (होटल, रेस्टोरेंट, उद्योग) को पीछे रखा जाता है ताकि आम जनता की रसोई गैस की जरूरतें पहले पूरी हों।
एलपीजी संकट के मुख्य कारण
- आयात पर निर्भरता: भारत की एलपीजी खपत का बड़ा हिस्सा आयात किया जाता है। जब भी अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में खाड़ी क्षेत्र में तनाव होता है या शिपिंग रूट बाधित होते हैं, तो घरेलू आपूर्ति प्रभावित होती है।
- भौगोलिक और राजनीतिक तनाव: वर्तमान में युक्रेन के बाद मध्य-पूर्व में यूएस–इज़राइल–ईरान संघर्ष के कारण Hormuz जलडमरुमार्ग बंद हुआ है, जिससे तेल और गैस शिपिंग ठहर गई है। फारस की खाड़ी से एलपीजी शिपमेंट बंद होने से देश में सप्लाई कड़ी हो गई।
- आपूर्ति शृंखला में समस्याएं: अंतरराष्ट्रीय शिपिंग की चुनौतियाँ (बढ़े हुए प्रीमियम, बीमा संकट) और घरेलू लॉजिस्टिक बाधाएं संकट को बढ़ाती हैं। उदाहरण के लिए, संकट के कारण कुछ व्यापारिक रफ़्तार धीमी पड़ी है और तेल टर्मिनल में इन्वेंट्री सीमित हो गई है।
- भंडारण की कमी: भारत में एलपीजी को बड़े पैमाने पर भंडारित करना मुश्किल है। विशेषज्ञों के अनुसार देश की कुल भंडारण क्षमता लगभग 1.9 मिलियन टन (लगभग 22 दिन की खपत) के बराबर है, जो बेहद कम है। सीमित स्टोरेज के चलते अचानक आयात रुकने पर देश भरोसेमंद भंडार से पूरा दबाव नहीं झेल पाता।
- अनियंत्रित मांग और काला बाज़ार: अफवाहों और घबराहट के चलते घरों में पेट्रोल की तरह सिलेंडर जमा कर लिए गए (“panic buying”), जिससे कमी और बढ़ गई है। कुछ जगहों पर काला बाज़ार भी शुरू हो गया, जहाँ वाणिज्यिक सिलेंडर बहुत महंगे दाम पर बिकने लगे।
संकट से निपटने में सरकार के कदम
सरकार ने एलपीजी आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए कई आपात उपाय लागू किए हैं:
- उत्पादन बढ़ाना: पेट्रोलियम मंत्रालय ने सभी रिफाइनरी को LPG उत्पादन अधिकतम करने का निर्देश दिया है। विशेष आदेशों से प्रोपीरीन/ब्यूटेन आदि स्ट्रीम LPG उत्पादन के लिए डायवर्ट किए गए, जिससे घरेलू उत्पादन में हालिया दिनों में 25-30% की वृद्धि दर्ज हुई। पांच दिन में ही उत्पादन 28% तक बढ़ गया, सरकारी आकड़ों के अनुसार।
- आवश्यक वस्तु अधिनियम (ECA): सरकार ने 8 मार्च को LPG कंट्रोल आर्डर जारी किया, जिसमें घरेलू कनेक्शन को पूरी आपूर्ति सुनिश्चित करने और वाणिज्यिक आपूर्ति को सीमित करने के निर्देश थे। इसी के तहत राज्य तेल कंपनियों को सभी LPG घरेलू सिलेंडर राज्यित बाजार में देने का आदेश मिला।
- वितरण व्यवस्थाएं मजबूत करना: हर घर को समय पर सिलेंडर मिले, इसके लिए ऑनलाइन बुकिंग को बढ़ावा दिया गया। केंद्र ने ऑनलाइन/IVRS/मोबाइल ऐप से बुकिंग को प्राथमिकता दी। ओटीपी सत्यापन (OTP) जैसी पारदर्शी व्यवस्था लागू की गई ताकि डीलरों द्वारा चोरबाज़ारी रोकी जा सके। शहरी क्षेत्रों में बुकिंग के बीच 25 दिन और ग्रामीण में 45 दिन का न्यूनतम अंतर निर्धारित किया गया।
- ऊर्जा विकल्प: आपूर्ति पर दबाव कम करने के लिए राज्य स्तर पर अस्थायी रूप से मिट्टी का तेल (पेड़ौल) और कोयला खाना पकाने के ईंधन के रूप में फिर से जारी किया गया। साथ ही, सरकार ने आपातकालीन स्थिति में घरेलू PNG/CNG को भी सर्वोच्च प्राथमिकता दी। LPG संकट के दौरान 47,000+ गैस कनेक्शन वाले परिवारों को PNG से जोड़ा गया।
- अतिरिक्त आयात एवं भंडारण: सरकार ने वैकल्पिक स्रोतों से एलपीजी आयात बढ़ाया – रूस, अमेरिका, नॉर्वे, कनाडा, अल्जीरिया जैसे देशों से सप्लाई जुटाई जा रही है। साथ ही क्रूड और LNG के दो-एक्स्ट्रा कार्गो देश की ओर भेजे गए ताकि होरमूज़ रुट की कमी पूरी हो सके। प्रमुख तेल टर्मिनलों पर एलपीजी कैरियर जहाज़ों को प्राथमिक तौर पर इजाजत दी गई ताकि पोर्ट पोर्ट लोडिंग तेज हो सके।
- जन जागरूकता: लोकल अखबारों और सोशल मीडिया के जरिये नागरिकों को केवल अधिकृत चैनलों (ऑनलाइन पोर्टल, डीलर एप्स) से सिलेंडर बुक करने की हिदायत दी गई। साइबर फ्रॉड की चेतावनी देकर फेक बुकिंग लिंक से बचने को कहा गया। पेट्रोल पंप और LPG एजेंसियों पर पुलिस-पुलिसिंग कर अफवाह रोकने में मदद की जा रही है।
संकट का प्रभाव
एलपीजी की कमी का सीधा असर लोगों और उद्योगों पर दिखा है:
- घरेलू उपयोग: सरकार की प्राथमिकता के कारण आम घरेलू परिवारों को रसोई गैस आपूर्ति बरक़रार रखी गई। फिर भी, अफवाह और होर्डिंग के कारण कई शहरों में लंबी कतारें लग गईं। कुछ जगहों पर नागरिकों ने कई घंटों तक लाइन में खड़े रहना पड़ा; पंजाब में एक व्यक्ति को सिलेंडर के लिए कतार में खड़े रहते हुए दिल का दौरा पड़ने से मृत्यु तक हुई।
- व्यावसायिक उपयोग: होटल, रेस्टोरेंट, ढाबे आदि को आपूर्ति सबसे पहले प्रभावित हुई। कई छोटे कैटरिंग व्यवसायों को 20% आपूर्ति दी जा रही है, बाकियों को रोका गया है। अनवरत रसोई चलाने वाले उद्योग बाधित हुए – केरल में उद्योग निकायों के अनुसार लगभग 40% रेस्टोरेंट बंद होने को हैं। इंडस्ट्री एसोसिएशंस ने चेताया कि आपूर्ति ना सुधरी तो अगले कुछ दिनों में 50-60% रेस्टोरेंट अपने दरवाजे बंद कर सकते हैं। कई व्यवसायों ने गैस बचाने के लिए इण्डक्शन चूल्हों या पुरानी लकड़ी-तवा तरीकों (जैसे पंजाब का एक ढाबा लकड़ी से रोटियां सेंक रहा था) का सहारा लिया।
- सामाजिक प्रभाव: कई राज्यों में एलपीजी की कमी को लेकर संकट प्रबंधन सेल बनाए गए और कंट्रोल रूम चलाए गए। उड़ीसा, पश्चिम बंगाल आदि में लंबी कतारें और आपूर्ति की शिकायतों के चलते सरकारी निगरानी बढ़ी। दिल्ली, पश्चिम बंगाल जैसे शहरों में लोग डर के चलते ज़रूरी नहीं ऑटोमेटिव गैस भरी लोगों के लिए सार्वजनिक फंड के माध्यम से इंतजाम किए गए (उदाहरण के लिए, दिल्ली में सार्वजनिक वितरण व्यवस्था के तहत अतिरिक्त कोयला जारी किया गया)।
- आर्थिक प्रभाव: एलपीजी की कमी से खाद्य व्यवसायों की लागत बढ़ी और किराना खाद्य दाम बढ़ने के भी संकेत मिले। कुछ रिपोर्टों के अनुसार, एलपीजी की किल्लत के चलते अंतरिम काल में बिजली चूल्हे, राइस कुकर, केतली इत्यादि मांग में तेज़ी आई। ग्राउंड रिपोर्ट्स में यह भी सामने आया कि काला बाज़ार में वाणिज्यिक सिलेंडर की कीमतें लगभग दुगनी हो गई थीं।
संभावित समाधान और दीर्घकालिक रणनीतियाँ
लघु और दीर्घकालीन दोनों स्तरों पर कई उपाय सुझाए जा रहे हैं:
- घरेलू उत्पादन बढ़ाना: पेट्रोलियम कंपनियाँ और गैस उत्पादक सरकारी कंपनियाँ (ONGC, GAIL आदि) घरेलू LPG उत्पादन बढ़ाने की दिशा में काम कर रही हैं। रिफाइनरियाँ अधिक कच्चा तेल प्रोसेस कर LPG निकालने पर जोर देंगी। साथ ही पेट्रोकेमिकल उद्योग के कुछ हिस्सों को LPG बनाने के लिए डायवर्ट करने का निर्णय लिया गया है। भविष्य में, प्रौद्योगिकी के जरिए भांगास (बायोगैस) जैसे वैकल्पिक गैसों का उत्पादन बढ़ाकर LPG की मांग कुछ कम की जा सकती है।
- आयात विविधीकरण: मध्य पूर्व के अलावा नई आपूर्ति शृंखलाएं विकसित की जा रही हैं। रूस, अमेरिका, नॉर्वे, अल्जीरिया से अतिरिक्त आयात बढ़ाकर निर्भरता घटाई जा रही है। समुद्री मार्ग में जोखिम को टालने के लिए रशिया/अमेरिका से वाहन (ईथेन/एनजी) खरीदने पर काम चल रहा है।
- इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास: देशभर में और अधिक LPG बॉटलिंग प्लांट, डिपो और भंडारण सुविधा बनाना आवश्यक है। अभी तक भारत में अवसंरचना की कमी के कारण घरेलू भंडारण 22 दिन तक ही सीमित है। भविष्य में भूमिगत या बड़े सिलेंडर भंडार (जैसे अमेरिका/यूरोप में) बनाना होगा। साथ ही गैस वितरण नेटवर्क (PNG, CNG पाइपलाइन) का विस्तार तेज करने पर भी जोर दिया गया है ताकि अंततः रसोई गैस की ज़रूरतों को पाइप्ड गैस से भी पूरा किया जा सके।
- एलपीजी सिलेंडर और डीलर नेटवर्क: वितरकों की संख्या बढ़ाई जा रही है – 2014 में देश में 13,896 डीलरशिप थीं, जो बढ़कर 2024 तक 25,481 हो गईं। इसी तरह रात-दिन सिलेंडर भरने की क्षमता बढ़ाने से भी आपूर्ति में सुधार होगा।
- ऊर्जा वैकल्पिक: लंबी अवधि में किराने और कुकर क्रांति समेत जैवईंधनों (बायोगैस, इथेनॉल) को बढ़ावा देकर एलपीजी पर दबाव कम किया जा सकता है। बिजली चूल्हों और सोलर कुकर्स को आम करना भी एक विकल्प हो सकता है।
- नीतिगत कदम: भंडार कानून में संशोधन करके एलपीजी को भी रणनीतिक भंडार में शामिल किया जा सकता है। लोकल निर्माताओं (ONGC/Oil India) को अनुसंधान में प्रोत्साहन देकर LPG उत्पादन में आत्मनिर्भरता बढ़ाई जा सकती है।
निष्कर्ष
एलपीजी की कमी एक जटिल ऊर्जा संकट है, जिसमें वैश्विक राजनीतिक तनाव, घरेलू आयात-निर्भरता और आपूर्ति-श्रृंखला की चुनौतियाँ एक साथ काम करती हैं। फिलहाल सरकार ने तत्काल कदम उठाकर घरेलू कनेक्शन को बचाए रखा है, लेकिन इसने यह भी साबित कर दिया है कि देश की ऊर्जा सुरक्षा में LPG एक संवेदनशील बिंदु है। दीर्घकालीन रूप से आत्मनिर्भरता बढ़ाने, वैकल्पिक ईंधन को बढ़ावा देने और ट्रांसपोर्ट-लॉजिस्टिक नेटवर्क मजबूत करने की आवश्यकता है।
आज की स्थिति बताती है कि “रसोई गैस” केवल एक घरेलू सुविधा नहीं, बल्कि लाखों परिवारों की जीवन रेखा है। इसे सुरक्षित रखने के लिए नीति निर्माता, उद्योग और नागरिकों को मिलकर काम करना होगा। उपभोक्ताओं को भी घबराहट से बचकर केवल आधिकारिक चैनलों से ही सिलेंडर बुक करना चाहिए। सभी आवश्यक कदम मिलकर उठाए जाएँ, तभी हम भविष्य में ऐसे संकटों से निपटने के लिए तैयार रहेंगे।
स्रोत: पेट्रोलियम मंत्रालय और PPAC की रिपोर्ट, समाचार एजेंसियाँ (रायटर्स, बिज़नस स्टैंडर्ड, टाइम्स ऑफ इंडिया, आदि) और उद्योग विश्लेषणों के आधार पर तैयार.










