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Sunday, February 22, 2026 3:37 am

“केरल सूचना आयोग का सख्त रुख: RTI लापरियों पर विभागों को देना होगा मुआवजा” “Kerala Information Commission Takes Firm Stand: Departments to Pay Compensation for RTI Lapses”

केरल राज्य सूचना आयोग ने एक ऐतिहासिक और सख्त निर्णय में स्पष्ट कर दिया है कि सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI Act) के तहत किसी भी प्रकार की लापरवाही या देरी की जिम्मेदारी संबंधित विभाग पर ही होगी। यदि कोई विभाग निर्धारित समय-सीमा में सूचना देने में असफल रहता है, गलत या अधूरी जानकारी देता है या किसी तरह का अनुचित शुल्क वसूलता है, तो उस विभाग को अब आवेदक को मुआवजा देना होगा।

केरल में हाल के वर्षों में RTI अधिनियम का उपयोग तो बढ़ा है, लेकिन साथ ही उससे संबंधित लापरवाहियों और जवाब न मिलने की शिकायतें भी तेजी से सामने आई हैं। हजारों मामलों में सूचना अधिकारी समय पर जवाब नहीं दे सके या जानबूझकर प्रक्रिया में देरी की। अब सूचना आयोग ने ऐसे रवैये को सहन न करने का फैसला लिया है और यह एक बड़ा संकेत है कि पारदर्शिता को केवल कागज़ों में नहीं बल्कि व्यवहार में भी लाना होगा।

आयोग की यह पहल तब सामने आई जब कुछ मामलों में आवेदकों ने स्पष्ट किया कि उन्हें जवाब मिलने के लिए कई महीनों तक इंतज़ार करना पड़ा, और कुछ मामलों में विभागों ने गैरकानूनी रूप से अतिरिक्त शुल्क वसूले। ये सभी प्रकरण अब केरल सूचना आयोग की जांच के दायरे में आ गए हैं और आयोग ने साफ कहा है कि ऐसी सभी त्रुटियों के लिए विभाग ही जिम्मेदार होगा, न कि आवेदक। इस व्यवस्था के तहत संबंधित विभागों को निर्देशित किया गया है कि वो मुआवजा राशि का भुगतान सीधे पीड़ित को करें, चाहे दोष सूचना अधिकारी का हो या विभागीय प्रणाली की कमी का।

RTI अधिनियम के अंतर्गत सूचना देने की एक स्पष्ट समय-सीमा निर्धारित की गई है—आवेदन प्राप्त होने के 30 दिनों के भीतर संबंधित जानकारी देना अनिवार्य है। लेकिन अनेक बार देखा गया है कि यह समयसीमा केवल औपचारिकता बन कर रह गई है। कई विभाग समय पर जवाब देने में नाकाम रहते हैं या फिर ऐसी तकनीकी समस्याओं का हवाला देते हैं जो वास्तव में आवेदकों को हतोत्साहित करने का तरीका बन गई हैं। अब आयोग की इस नई नीति से यह रुकावट भी हटेगी क्योंकि जवाबदेही तय हो गई है।

इस निर्णय का सीधा असर उन हजारों लोगों पर पड़ेगा जो RTI के माध्यम से सरकारी प्रक्रियाओं, नीति निर्माण, बजट खर्च या परियोजनाओं से संबंधित जानकारी मांगते हैं। अक्सर यह देखा गया है कि सूचनाएं समय पर नहीं मिलतीं, कुछ अधिकारी जानबूझकर मामले को लटकाए रखते हैं और आवेदक महीनों तक इंतजार करता रह जाता है। अब आयोग के आदेश से यह व्यवस्था बदलने की उम्मीद की जा रही है।

इतना ही नहीं, आयोग ने यह भी स्पष्ट किया है कि केवल राज्य सरकार के अंतर्गत आने वाले विभाग ही नहीं, बल्कि स्वायत्त संस्थान, निगम और अन्य वित्तीय रूप से सहायता प्राप्त संस्थाएं भी इस दायरे में आएंगी। इसका मतलब है कि बार एसोसिएशन, कोऑपरेटिव बैंक, सरकारी शिक्षण संस्थान और स्थानीय निकाय भी यदि सूचना देने में चूक करते हैं तो उन्हें भी मुआवजा देना पड़ेगा।

यह फैसला RTI के मूल उद्देश्यों के अनुरूप है—सरकार और उसके विभागों को जनता के प्रति जवाबदेह बनाना। सूचना अधिकार अधिनियम केवल एक कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि लोकतंत्र को मजबूत करने का एक प्रभावी माध्यम है। इससे नागरिकों को यह भरोसा मिलता है कि वे सरकार से जवाब मांग सकते हैं और उन्हें वह जानकारी समय पर और बिना किसी अवरोध के प्राप्त होनी चाहिए।

इस नई नीति के लागू होने से अब विभागों को न केवल प्रक्रियाओं को अधिक संगठित करना होगा, बल्कि सूचना अधिकारियों को समय-सीमा का पालन करने के लिए भी प्रशिक्षित करना होगा। साथ ही, विभागों को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि किसी भी प्रकार की गलत सूचना, विलंब या शुल्क की वसूली से बचा जाए क्योंकि अब ये सब बातें आर्थिक दंड का कारण बन सकती हैं।

सूचना आयोग ने यह संदेश भी स्पष्ट किया है कि भविष्य में यदि किसी भी विभाग में यह लापरवाही दोहराई गई तो कठोर कार्रवाई की जाएगी, जिसमें दंड, वेतन कटौती या अनुशासनात्मक कदम तक शामिल हो सकते हैं। यह प्रशासनिक ढांचे में पारदर्शिता और जवाबदेही की दिशा में एक ठोस कदम है।

इस पूरे घटनाक्रम ने उन आम लोगों को भी ताकत दी है जो अक्सर यह सोचकर पीछे हट जाते थे कि RTI लगाने का कोई लाभ नहीं होगा। अब जब आयोग ने उनके पक्ष में न केवल अधिकारिक आदेश जारी किए हैं, बल्कि मुआवजा भी दिलाने का रास्ता साफ कर दिया है, तो आने वाले समय में RTI का उपयोग और बढ़ने की संभावना है।

निष्कर्ष:
केरल सूचना आयोग का यह निर्णय एक बड़ी पहल है जो RTI प्रणाली की विश्वसनीयता को फिर से मजबूत करेगा। यह न केवल सरकारी विभागों में पारदर्शिता लाएगा, बल्कि जनता को यह संदेश भी देगा कि उनका अधिकार अब केवल एक अधिनियम नहीं, बल्कि एक व्यावहारिक हक़ है। आयोग का यह आदेश बाकी राज्यों के लिए भी एक उदाहरण बनेगा और उम्मीद की जानी चाहिए कि पूरे भारत में RTI को गंभीरता से लागू किया जाएगा।

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