इन्फोसिस ने हाल ही में अपने कर्मचारियों को एक निजी ई-मेल भेजा, जिसमें कंपनी ने साफ कहा है कि अब ओवरटाइम करने की गुंजाइश मना है। नारायण मूर्ति के पिछले साल दिए गए “सप्ताह में 70 घंटे काम करें” सुझाव की किरण के उलट, इन्फोसिस अब कर्मचारियों को उनकी स्वास्थ्य और निजी जीवन पर ध्यान देने की हिदायत दे रहा है।
कंपनी ने यह कदम ऐसे समय लिया है जब दूरस्थ (WFH) और हाइब्रिड वर्क कल्चर ने कर्मचारियों को अक्सर दीर्घकालिक काम के दबाव में डाल दिया है। इन्फोसिस ने आंतरिक मोर्चे पर अभियान शुरू किया है, जिसमें कर्मियों के लॉग‑इन समय और कार्य अवधी की निगरानी होती है। यदि किसी कर्मचारी ने नियोजित समय से अधिक काम किया, तो एचआर द्वारा उन्हें व्यक्तिगत रूप से सीधी ई‑मेल के जरिए सलाह दी जाती है कि यह आदत स्वास्थ्य और वर्क‑लाइफ इकोनॉमी के लिहाज से ठीक नहीं है।
कंपनी ने विशेष रूप से यह स्पष्ट किया है कि “ओवरटाइम को बढ़ावा नहीं दिया जाएगा” और यह नीति स्वच्छ और संतुलित कार्य‑दिन सुनिश्चित करने के लिए अपनाई गई है। इन्फोसिस ने यह भी कहा है कि उनकी मुख्य प्राथमिकता है कर्मचाऱियों का कल्याण, क्योंकि कंपनी के अनुसार केवल मेहनत ही नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य और पर्याप्त आराम भी लंबे समय में उत्पादकता और नवाचार के लिए जरूरी हैं।
यह कदम इसलिए भी खास है क्योंकि अतीत में जब मूर्ति ने 70‑घंटे दौड़ लगाने की बात कही थी, तब उसे देश में पत्रकारों से लेकर सोशल मीडिया तक अधिकांश जगहन विरोध का सामना करना पड़ा था। लेकिन कंपनी की यह नई नीति साबित करती है कि पाठकों के बदलते दौर में वर्क‑कल्चर और ऑर्गनाइजेशनल सोच भी बदल रही है।
विशेषज्ञ बताते हैं कि ये बदलाव इन्फोसिस जैसे बड़े आईटी दिग्गजों के लिए रणनीतिक महत्व रखते हैं। क्योंकि बेहतर वर्क‑लाइफ संतुलन से कर्मचारी अधिक समय तक स्वस्थ, प्रेरित और रिलायबल बने रहते हैं। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन के अध्ययनों से भी पता चलता है कि लगातार ओवरटाइम करने से “बर्नआउट, तनाव और पुरानी बीमारियों” का जोखिम बढ़ता है।
हाल के समय में कई वैश्विक कंपनियां अपनी HR नीतियों में इस दिशा में बदलाव ला रही हैं। इन्फोसिस का यह प्रोग्राम इसी ग्लोबल ट्रेंड का हिस्सा प्रतीत होता है। कंपनी का उद्देश्य है ऐसा वातावरण तैयार करना जिससे कर्मचारी नौकरी छोड़ने की बजाय निष्पादन बढ़ाएं, और दीर्घकालिक सहयोग बढ़े।
एक ओर जहां नारायण मूर्ति ने यह स्पष्ट किया कि “70‑घंटे उनका व्यक्तिगत विकल्प था और वह इसे दूसरों पर थोपना नहीं चाहते”, वहीं दूसरी ओर इन्फोसिस — उनका ही संस्थान — कर्मचारियों को यह याद दिला रहा है कि काम से ज़्यादा जरूरी है आपका स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता।
इस बदलाव ने इंडियन IT सेक्टर में “वर्क लाइफ बैलेंस” की चर्चा को और गति दी है— विशेषकर वर्क‑फ्रॉम‑होम की लचीलापन और नए वर्कफ़्लो मॉडल्स को लेकर। कर्मचारी अब सिर्फ मानदेय और कैरियर वृद्धि की ओर देखना नहीं चाहते, बल्कि एक संतुलित जीवन भी महत्वपूर्ण मानते हैं।
इन्फोसिस का यह कदम इस बात की पुलशाही ठहराता है कि यदि कोई कंपनी अपने कर्मचारियों को आराम, सहूलियत और सम्मान देती है, तो कंपनी की दीर्घकालिक सफलता की बुनियाद मजबूत होती है। वहीं, यदि ओवरटाइम को अनियंत्रित रूप से स्वीकृति मिलती रही तो वह बर्नआउट का और मशीनों की हिंसक गुलामी का कारण बन सकता है।
इन्फोसिस की इस नीति ने नोबेल पुरस्कार विजेता मूर्ति के विचारों से हटकर एक नया संदेश दिया है: “काम ठीक है, लेकिन जीवन उससे बड़ा है।”
अब देखना यह है कि क्या यह पायलट अभियान IT इंडस्ट्री में सराहनीय उदाहरण बनेगा? या फिर कई कंपनियों के लिए यह चेतावनी कि कर्मचारी जीवन की कीमत पर काम का बोझ बढ़ाने से दीर्घकाल में टर्नओवर जरूरी नहीं, बर्नआउट हो सकता है।
इस उत्साहजनक बदलाव को देख अब उद्योग जगत की निगाहें इधर टिक गई हैं— क्योंकि संतुलन ही भविष्य की कुंजी है।







