पश्चिम एशिया में जारी युद्ध और बढ़ते वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच भारत के लिए एक राहत भरी खबर सामने आई है। युद्धग्रस्त होर्मुज़ जलडमरूमध्य से दो भारतीय झंडा लगे एलपीजी टैंकर सुरक्षित बाहर निकल गए हैं। हालांकि इस घटनाक्रम के साथ ही एक नया विवाद भी जुड़ गया है, जिसमें ईरान ने उन खबरों को सिरे से खारिज कर दिया है कि उसने इन जहाजों को गुजरने देने के लिए किसी तरह की फिरौती या भुगतान की मांग की थी।
सरकारी अधिकारियों के अनुसार, ‘जग वसंत’ और ‘पाइन गैस’ नामक ये दोनों टैंकर करीब 92,600 टन रसोई गैस लेकर सोमवार शाम इस संवेदनशील समुद्री मार्ग से गुजरने में सफल रहे। ये जहाज अगले कुछ दिनों में भारत के पश्चिमी तट पर स्थित बंदरगाहों तक पहुंचने वाले हैं।
यह घटनाक्रम इसलिए बेहद अहम माना जा रहा है क्योंकि होर्मुज़ जलडमरूमध्य इस समय दुनिया के सबसे खतरनाक समुद्री मार्गों में से एक बन चुका है। अमेरिका-इज़राइल और ईरान के बीच जारी संघर्ष के कारण इस क्षेत्र में जहाजों की आवाजाही लगभग ठप हो चुकी है और कई देशों ने अपने जहाजों को इस मार्ग से भेजने से परहेज किया है।
भारत के लिए यह केवल एक सामान्य शिपिंग ऑपरेशन नहीं था, बल्कि एक बड़ी रणनीतिक और कूटनीतिक सफलता भी है। दरअसल, इस युद्ध के शुरू होने के बाद से अब तक चार भारतीय टैंकर इस खतरनाक रास्ते से गुजरने में सफल रहे हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि भारत लगातार अपने ऊर्जा आपूर्ति मार्गों को सुरक्षित रखने के लिए सक्रिय प्रयास कर रहा है।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक बड़ा विवाद उस समय खड़ा हुआ जब कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि ईरान ने जहाजों को सुरक्षित रास्ता देने के बदले लाखों डॉलर की मांग की थी। हालांकि, ईरान ने इन आरोपों को पूरी तरह निराधार बताया है और कहा है कि उसने किसी भी देश से इस तरह की कोई राशि नहीं मांगी।
भारत सरकार ने भी पहले ऐसे किसी “सौदे” की खबरों को खारिज किया था और स्पष्ट किया था कि भारतीय जहाजों के सुरक्षित आवागमन के लिए किसी तरह का लेन-देन या समझौता नहीं किया गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की अफवाहें ऐसे समय में और तेजी से फैलती हैं जब वैश्विक तनाव चरम पर हो। होर्मुज़ जैसे संवेदनशील क्षेत्र में जहां हर जहाज की आवाजाही जोखिम से भरी होती है, वहां किसी भी तरह की गलत जानकारी बाजार और कूटनीतिक माहौल दोनों को प्रभावित कर सकती है।
होर्मुज़ जलडमरूमध्य का महत्व इसी बात से समझा जा सकता है कि दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल और गैस का व्यापार इसी रास्ते से होता है। ऐसे में यहां किसी भी तरह की बाधा सीधे वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित करती है।
वर्तमान संकट के दौरान जहाजों की आवाजाही में भारी गिरावट आई है। कई शिपिंग कंपनियों ने सुरक्षा कारणों से अपने जहाजों को रोक दिया है, जबकि कुछ ही देशों के जहाज, विशेष परिस्थितियों और समन्वय के तहत, इस मार्ग से गुजर पा रहे हैं।
भारत की स्थिति इस पूरे संकट में काफी संवेदनशील है क्योंकि देश अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, जिसमें से एक बड़ा भाग इसी मार्ग से होकर आता है। ऐसे में इन टैंकरों का सुरक्षित पहुंचना भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
सरकार की प्राथमिकता फिलहाल उन 20 से अधिक भारतीय जहाजों और हजारों भारतीय नाविकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है, जो अभी भी इस क्षेत्र में मौजूद हैं।
कूटनीतिक स्तर पर भी भारत सक्रिय भूमिका निभा रहा है। हाल ही में उच्च स्तर पर बातचीत के जरिए यह सुनिश्चित करने की कोशिश की गई है कि भारतीय जहाजों को सुरक्षित मार्ग मिल सके और किसी भी तरह की सैन्य कार्रवाई से उन्हें नुकसान न पहुंचे।
इस पूरे घटनाक्रम का एक बड़ा असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी देखने को मिल रहा है। तेल और गैस की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव हो रहा है और कई देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर दबाव बढ़ रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर होर्मुज़ जलडमरूमध्य पूरी तरह बंद हो जाता है, तो यह 1970 के दशक के तेल संकट से भी बड़ा झटका साबित हो सकता है। ऐसे में भारत जैसे देशों के लिए वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों और आपूर्ति मार्गों पर काम करना और भी जरूरी हो गया है।
सामाजिक स्तर पर भी इस संकट का असर दिखाई दे रहा है। भारत में हाल ही में ईंधन को लेकर फैली अफवाहों ने यह दिखा दिया कि वैश्विक घटनाएं किस तरह स्थानीय स्तर पर भी घबराहट पैदा कर सकती हैं।
ईरान द्वारा फिरौती की खबरों को खारिज करना भी इस बात का संकेत है कि वह इस संकट में अपनी छवि को संतुलित रखने की कोशिश कर रहा है। अंतरराष्ट्रीय दबाव और संभावित प्रतिबंधों के बीच ईरान यह संदेश देना चाहता है कि वह समुद्री व्यापार को पूरी तरह बाधित करने के पक्ष में नहीं है, बल्कि रणनीतिक दबाव बनाने की नीति अपना रहा है।
विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि इस पूरे घटनाक्रम में “चयनात्मक अनुमति” की नीति अपनाई जा रही है, जहां कुछ देशों के जहाजों को गुजरने दिया जा रहा है, जबकि अन्य के लिए मार्ग जोखिम भरा बना हुआ है।
आने वाले दिनों में यह स्थिति और जटिल हो सकती है। अगर युद्ध और बढ़ता है, तो समुद्री मार्गों पर खतरा भी बढ़ेगा और वैश्विक ऊर्जा संकट गहराएगा।
फिलहाल, भारत के लिए यह एक राहत भरा क्षण जरूर है कि उसके जहाज सुरक्षित निकलने में सफल रहे हैं। लेकिन यह भी साफ है कि यह संकट अभी खत्म नहीं हुआ है और आने वाले समय में ऊर्जा, कूटनीति और सुरक्षा—तीनों मोर्चों पर भारत को सतर्क रहना होगा।










