नई दिल्ली: भारत के सर्वोच्च न्यायालय में वर्तमान में चल रही विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) से जुड़ी सुनवाई के दौरान भारतीय चुनाव आयोग (EC) ने एक महत्वपूर्ण दलील पेश की है कि देश की मतदाता सूची (Electoral Roll) में शामिल होने के लिए भारतीय नागरिकता को निरंतर पूरा करना जरूरी है। इस प्रभावशाली बयान ने मतदाता पहचान, नागरिकता प्रमाणन और चुनावी अधिकारों के दायरे पर एक संवैधानिक बहस को तेज कर दिया है, जिसका व्यापक राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव है।
यह मामला सुप्रीम कोर्ट में उठी याचिकाओं के संदर्भ में सुना जा रहा है, जिनमें चुनाव आयोग की SIR प्रक्रिया को चुनौती दी गई है। SIR का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सभी पात्र भारतीय नागरिकों का नाम मतदाता सूची में शामिल रहे, और अयोग्य, मृत या लंबे समय से निवास-स्थान परिवर्तन वाले व्यक्तियों को हटाया जाए। चुनाव आयोग का तर्क है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया की शुचिता और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए यह आवश्यकता संविधान तथा विधिक ढांचे के अनुरूप है।
इस सुनवाई के दौरान आयोग ने अदालत को बताया कि मतदाता सूची में बने रहने का अधिकार एक संशोधित, योग्य अधिकार (qualified right) है और इसे केवल जन्म के समय प्राप्त कर लिया जाना पर्याप्त नहीं है। आयोग के वकील ने स्पष्ट किया कि भारतीय नागरिकता की स्थिति को सतत रूप से पूरा करना आवश्यक है, यानी किसी भी व्यक्ति को सूची में जारी रहने के लिए आवश्यक मानदंडों का पूरा किया जाना आवश्यक है, जिसमें नागरिकता की निरंतर पुष्टि भी शामिल है।
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष यह बहस एक संवैधानिक और संवेदनशील मुद्दे की ओर जाती है क्योंकि मतदाता सूची और नागरिकता के बीच का संबंध सीधे लोकतांत्रिक अधिकार — मत देने का अधिकार — से जुड़ा हुआ है। संविधान का अनुच्छेद 326 वयस्क मताधिकार को भारतीय नागरिकता, 18 वर्ष की आयु तथा विशिष्ट अयोग्यताओं के अभाव से निर्धारित करता है। आयोग का तर्क यह है कि सूची में बने रहना भी इसी मूल शर्त का अभ्यस्त अनुपालन चाहता है।
हालांकि, यह दलील न्यायालय में कुछ सवालों को भी जन्म देती है। विपक्षियों और याचिकाकर्ताओं ने यह तर्क दिया है कि निर्वाचन आयोग के पास नागरिकता तय करने का प्राधिकार नहीं है, और यदि कोई व्यक्ति अपनी नागरिकता साबित नहीं कर पाता है, तो उसका नाम मतदाता सूची से हटाने के बजाय उसकी स्थिति का निर्णय उन विधिक प्राधिकरणों के पास भेजा जाना चाहिए जो संविधान के तहत यह अधिकार रखते हैं। जैसे कि केंद्र सरकार की ओर से गठित विदेशी न्यायाधिकरण या अदालतें, नागरिकता आधारित निर्णय लेने के लिए अधिकृत हैं।
सुनवाई में यह भी चर्चा हुई है कि SIR प्रक्रिया, यदि इसमें नागरिकता निर्धारण शामिल हो जाए, तो वह अप्रत्यक्ष रूप से राष्ट्रीय नागरिक रजिस्ट (NRC) की तरह एक रूपांतरण का काम कर सकता है। यह चिंता विपक्षी दलों और सामाजिक प्रतिभागियों ने उठाई है, जिनका मानना है कि चुनाव आयोग का यह कदम संविधान में निर्दिष्ट अधिकार सीमा से बाहर जा सकता है और मतदाता अधिकार की सार्वभौमिकता के सिद्धांत का उल्घन कर सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने विचारों में संकेत दिया है कि निर्वाचन आयोग स्वयं नागरिकता देने या चार्ज करने का निर्णय नहीं ले सकता, बल्कि वह केवल मतदाता पंजीकरण से जुड़े दस्तावेजों और पात्रता की जांच कर सकता है। नागरिकता का निर्णय संविधान तथा संबंधित कानूनों के आधार पर सम्बंधित विभागों और न्यायिक निकायों को ही सौंपी जा सकती है।
मतदाता सूची में बने रहने के लिए नागरिकता की निरंतर पूर्ति से जुड़ा यह मुद्दा चुनावी प्रक्रिया की गहराई को भी उजागर करता है। जहां एक ओर यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता को बढ़ाने की आवश्यकता से जुड़ा है, वहीं दूसरी ओर यह मतदाता अधिकारों की सुरक्षा और नागरिकता के संवैधानिक प्रावधानों के बीच संतुलन बनाने के लिए भी महत्वपूर्ण है।
विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) पर लंबी विद्यमान बहस और अदालत में उठे सवाल न केवल विधिक दायरे, बल्कि भारत की लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की संरचना को भी चुनौती दे रहे हैं। यह मामला संविधान के उस मूल सिद्धांत का परीक्षण करता है जिसमें हर भारतीय नागरिक को मत देने का अधिकार प्राप्त है, परंतु यह अधिकार नागरिकता के सतत अनुपालन की शर्तों और प्रक्रिया के अनुरूप कब, कैसे और किन शर्तों पर समाप्त हो सकता है, इसे स्पष्ट रूप से परिभाषित करना न्यायालय के सामने अब प्राथमिक प्रश्न बन चुका है।
अभी इस मामले की सुनवाई सर्वोच्च न्यायालय में जारी है, और जैसे-जैसे अदालत विस्तृत प्रश्नों का समाधान करेगी, मतदाता सूची, नागरिकता प्रमाणन एवं लोकतांत्रिक अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करने के लिए महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश मिलने की उम्मीद है।





