बजट 2026 में सरकार ने यह साफ कर दिया है कि आर्थिक विकास की रफ्तार बनाए रखते हुए वित्तीय घाटे (Fiscal Deficit) को नियंत्रित करना उसकी प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल है। यह बजट किसी झटके वाले फैसले के बजाय धीरे-धीरे, योजनाबद्ध और भरोसेमंद तरीके से घाटा कम करने की रणनीति पेश करता है।
वित्तीय घाटा उस स्थिति को दर्शाता है जब सरकार का कुल खर्च उसकी कुल आय से अधिक होता है। लंबे समय तक ज्यादा घाटा रहने से महंगाई, ब्याज दर और कर्ज पर दबाव बढ़ सकता है। इसी वजह से बजट 2026 में सरकार ने संतुलन पर खास जोर दिया है।
बजट 2026 का मूल संदेश यह है कि सरकार न तो विकास खर्च में कटौती करेगी और न ही अचानक सख्ती से घाटा घटाने की कोशिश करेगी। इसके बजाय राजकोषीय अनुशासन और विकास दोनों को साथ लेकर चलने का रास्ता चुना गया है।
सरकार ने साफ संकेत दिए हैं कि वित्तीय घाटा कम करने की प्रक्रिया क्रमिक होगी। इसका मतलब यह है कि हर साल घाटे को थोड़ा-थोड़ा कम किया जाएगा, ताकि अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक असर न पड़े और विकास की गति बनी रहे।
बजट 2026 में घाटा नियंत्रण का पहला आधार राजस्व बढ़ाना है, न कि केवल खर्च काटना। टैक्स सिस्टम को सरल बनाकर, अनुपालन बढ़ाकर और डिजिटल टैक्स प्रशासन को मजबूत करके सरकार आय के स्रोत बढ़ाने पर ध्यान दे रही है।
डिजिटल टैक्स व्यवस्था, फेसलेस असेसमेंट और डेटा-आधारित निगरानी से टैक्स चोरी पर रोक लगेगी। इससे बिना टैक्स दर बढ़ाए सरकारी राजस्व में सुधार होने की उम्मीद है, जो घाटा कम करने में मदद करेगा।
दूसरा बड़ा कदम है खर्च की गुणवत्ता सुधारना। बजट 2026 में यह साफ दिखता है कि सरकार अनुत्पादक खर्च से बचते हुए पूंजीगत व्यय पर फोकस कर रही है। इंफ्रास्ट्रक्चर, ऊर्जा और डिजिटल परियोजनाओं पर खर्च को निवेश के रूप में देखा जा रहा है।
पूंजीगत व्यय से भविष्य में आय और रोजगार पैदा होते हैं। इससे सरकार की कर आय बढ़ती है और लंबे समय में घाटा अपने आप नियंत्रित होता है। बजट 2026 इसी सोच को आगे बढ़ाता है।
सब्सिडी को भी बजट 2026 में अधिक लक्षित और प्रभावी बनाने की कोशिश की गई है। अनावश्यक और व्यापक सब्सिडी के बजाय जरूरतमंद वर्ग तक सीधी सहायता पहुंचाने पर जोर दिया गया है। इससे सरकारी खर्च पर दबाव कम होगा।
डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर और डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए सब्सिडी वितरण से लीकेज कम होती है। बजट 2026 में इस व्यवस्था को और मजबूत करने का संकेत दिया गया है।
बजट 2026 में कर्ज प्रबंधन को भी गंभीरता से लिया गया है। सरकार ने यह स्पष्ट किया है कि उधारी का उपयोग विकासात्मक परियोजनाओं के लिए होगा, न कि केवल खर्च चलाने के लिए। इससे कर्ज की उपयोगिता और विश्वसनीयता बनी रहती है।
वित्तीय घाटा कम करने की रणनीति में आर्थिक वृद्धि सबसे अहम भूमिका निभाती है। जब जीडीपी तेजी से बढ़ती है, तो घाटे का अनुपात अपने आप घटने लगता है। बजट 2026 में विकास को प्राथमिकता देकर इसी लक्ष्य को साधा गया है।
महंगाई नियंत्रण भी घाटा प्रबंधन से जुड़ा हुआ है। बजट 2026 में आपूर्ति सुधार, इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश और लॉजिस्टिक्स लागत घटाने पर जोर दिया गया है, ताकि कीमतों पर नियंत्रण बना रहे और आर्थिक स्थिरता कायम हो।
वैश्विक निवेशकों और रेटिंग एजेंसियों के लिए भी वित्तीय घाटे का रास्ता बेहद अहम होता है। बजट 2026 में अपनाई गई संतुलित नीति से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की आर्थिक विश्वसनीयता मजबूत होने की उम्मीद है।
सरकार का मानना है कि अचानक सख्ती से घाटा घटाने की नीति सामाजिक और आर्थिक नुकसान पहुंचा सकती है। इसलिए बजट 2026 में धीमी लेकिन स्थिर रणनीति अपनाई गई है, जिससे विकास और कल्याण दोनों सुरक्षित रहें।
राज्यों के साथ समन्वय भी घाटा प्रबंधन का अहम हिस्सा है। बजट 2026 में केंद्र-राज्य वित्तीय तालमेल को मजबूत करने के संकेत मिले हैं, ताकि समग्र सरकारी घाटा नियंत्रित रहे।
कुल मिलाकर, बजट 2026 में वित्तीय घाटे को कम करने का रास्ता यथार्थवादी और भरोसेमंद नजर आता है। यह न तो लोकलुभावन है और न ही कठोर। इसमें संतुलन, अनुशासन और विकास का स्पष्ट मिश्रण दिखाई देता है।
यह बजट यह संदेश देता है कि भारत अब वित्तीय प्रबंधन में परिपक्वता की ओर बढ़ रहा है। अगर यह रणनीति लगातार लागू होती रही, तो आने वाले वर्षों में मजबूत विकास के साथ-साथ स्थिर और नियंत्रित वित्तीय ढांचा देखने को मिल सकता है।














